क्या मिलेगा शराब पर प्रतिबंध लगाकर

21 अक्तूबर 2016   |  हरीश भट्ट   (213 बार पढ़ा जा चुका है)

 क्या मिलेगा शराब पर प्रतिबंध लगाकर


समझ नहीं आता शराब पर प्रतिबंध लगाकर क्या मिल जाएगा. शराब ही तो वह माध्यम है जो समाज के हर वर्ग में समानता का अहसास कराती है. बस फर्क है तो शब्दों का, अमीर ने पी तो ड्रिंक की और गरीब ने मुंह से लगा दिया तो दारूबाज. फिर शराब ही तो है जो आदमी के हर दु:ख-दर्द को भुला देती है. वैसे भी उसके दु:खों को दूर करना किसी के बस में नहीं है. अच्छा ही है वह शराब पीकर अपने दु:खों को भूल रहा है. शराब में वह शक्ति है कि चूहे को शेर बना देती है. फिर जब चूहा दो घूंट पीकर शेर बन सकता है तो किसी को क्या परेशानी. दूसरा शराबी के पास पेट भरने के लिए भले ही रोटी का जुगाड़ न हो, पर पीने के लिए हमेशा जेब में पैसे मिल जाएगे. यही शराब को अलग बना देती है. फिजूल में ही शराब पर प्रतिबंध लगाने की कवायद समय-समय पर होती रहती है. अगर शराब पर प्रतिबंध लग गया तो उनका क्या होगा, जो शराब के धंधे में लगे हुए है, क्या वह बेरोजगार नहीं हो जाएगे. उनके लिए रोजगार उपलब्ध कराना सबसे बड़ा सिर-दर्द बन जाएगा. वैसे ही यहां बेरोजगारों की गिनती दिन-दुगुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है. अच्छा ही तो है शराब से जुड़े हुए कम से कम किसी को परेशान तो नहीं करते. यह अलग बात है कि कितने अब तक शराब की भेंट चढ़ गए. अब शराब को गले लगाना है तो किसी तो त्यागना होगा. और शराबी से बड़ा ईमानदार कौन होगा, जो सब कुछ छोड़ सकता है, पर शराब नहीं छोड़ सकता, भले ही इसके लिए वह अपने घर-परिवार को दांव पर लगा दें. फिर शराब बंद हो गई तो हमारे नेताओं का क्या होगा, क्योंकि शराब बंद होने के बाद आम जनता की चेतना जागृत हो जाएगी. अगर चेतना जागृत हो गई तो वह अपना हक मांगेगे, जिसको पूरा करना नेताओं के बस में नहीं है. एक बेरोजगार शराब में नशे में अपना गम भुला रहा है तो किसी को क्या दिक्कत. शराब पर प्रतिबंध लग गया तो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पुलिस वालों के दिल भी पर चोट लगेगी, उनकी नाराजगी को झेलने की हिम्मत कौन दिखाएगा. फिर सरकार के खजाने का क्या होगा. शराब की वजह से उसका खजाना भरा रहता है. शराब बहुत तेजी से अपना असर दिखाती है, शराब के व्यवसाय में लगे व्यक्ति जितनी तेजी से अमीर होते जाते है, उतनी ही तेजी से शराब पीने वाला मौत की ओर. वैसे भी हमारा उद्देश्य गरीब को हटाना गरीबी को नहीं. फिर इससे अच्छा दूसरा कौन उपाय है, गरीब को दूर करने का. ‘हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. वैसे ही शराब हमारी सम्पन्नता की प्रतीक है. खुद ही देखिए खुशी के मौके पर शराब न परोसी जाए तो उसको मेजबान को दकियानूसी समझा जाता है, फिर कौन ऐसा होगा जो खुद को दकियानूसी कहलाना पसंद करेगा. सालों-साल किसी की खुशी में शामिल होने के लिए अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके उसकी खुशियों को चार चांद लगाने पहुंचे चांद को अगर शराब न मिले तो उसका मन दु:खी नहीं होगा. और हम अपने मेहमान को दु:खी कैसे कर सकते है. समझ नहीं आता है क्यों आए दिन शराब पर प्रतिबंध लगाने की बात की जाती है. शराब बंद होते ही समस्याओं का अंबार लग जाएगा. और पहले ही इतनी समस्याएं है कि उनका तो हल निकलता नहीं, और नई समस्याओं के लिए दरवाजा खोल दें

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