देश का बुरा हाल है

27 अक्तूबर 2016   |  शिवदत्त   (74 बार पढ़ा जा चुका है)

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय


हर किसी की ज़ुबाँ पर बस यही सवाल है

करने वाले कह रहे, देश का बुरा हाल है ||


नेता जी की पार्टी मे फेका गया मटन पुलाव

जनता की थाली से आज रूठी हुई दाल है||


राशन के थैले का ख़ालीपन बढ़ने लगा

हर दिन हर पल हर कोई यहाँ बेहाल है||


पैसे ने अपनो को अपनो से दूर कर दिया

ग़रीबी मे छत के नीचे राजू और जमाल है||


आंशु बहा-बहा कर भी थकता कहाँ है वो

ये ग़रीब की अमीर आँखो का कमाल है||

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