मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

29 अक्तूबर 2016   |  हरीश भट्ट   (1091 बार पढ़ा जा चुका है)

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना



हिंदू समाज सदा से जात-पात, ऊंच-नीच के फेर में फंसा रहा. भोग-विलासिता पूर्ण जीवन जीने की लालसा में अपनों को भुलाने वाले हिंदू समाज में कभी भी एकता नहीं रही. परिणाम स्वरूप पहले मुगलों ने अपना गुलाम बनाया. हिंदू राजाओं ने भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए उन्हें गले लगाकर भाई बना लिया. चलिए अच्छी बात थी. लेकिन उसके बाद भी हालात सुधरने के बजाए और बिगड़ गए. अंग्रेजों की कुत्सित नजर भारत पर पड़ गई. सालों के संघर्ष के बाद अंग्रेजी दासता से मुक्ति तो मिल गई, लेकिन सबक कुछ नहीं सीखा. जब खुद पर भरोसा न हो तो किसी भी भरोसा नहीं करना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो. वर्तमान में भी कुछ ऐसे ही हालात बनाए जा रहे है. हजारों वर्षों से साथ-साथ रहने के बाद ही एक बात निकल कर आई थी कि हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई. तब क्यों इन दोनों को आपस में लड़ाने की साजिश क्यों की जाती है. कल्पनाओं में जीने वाले भारतीय युवाओं की धड़कनों पर राज करने वाले तीन खान हो या शमशाद बेगम, नूरजहां, मोहम्मद रफी, सलमा आगा, शमां परवीन और गुलाम अली के मधुर संगीत आज भी मन को सुकून देता है. विश्व के सात अजूबों में शामिल ताजमहल (भले ही इतिहास कुछ रहा हो) पर है तो भारत की शान ही. सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा, लिखने वाले मोहम्मद इकबाल को कौन भारतीय भुला सकता है. आधी-अधूरी बातों के साथ सिर्फ इतनी सी बात है कि इंसानियत को शर्मसार करने वाले आतंकी कहीं भी कोई भी हो सकते है. जिनका मकसद सिर्फ अपने स्वार्थ पूरा करना होता है. आपस में लडऩे की बजाए नेताओं के पॉवर गेम को समझने की आवश्यकता है, आखिर वह क्यों लोकतंत्र के माध्यम से अपना राजतंत्र मजबूत करने में जुटे हुए है. राजनेता पूरी ईमानदारी से अपना मकसद हासिल करने की कोशिश कर रहे है, तो आम इंसान क्यों अपने संबंधों को उधेडऩे की कोशिश कर रहा है. अब इन बातों का कोई मतलब नहीं रहता है तुम उस पार-हम इस पार, यह गए जमाने की बात हो गई. अब असल वक्त आया है जब वास्तव में यह दिखाना है
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना.
हिंदी है हम वतन है, हिंदुस्तान हमारा.

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