नोटबंदी मुसबीत या फेस्टिवल

13 नवम्बर 2016   |  हरीश भट्ट   (132 बार पढ़ा जा चुका है)

 नोटबंदी मुसबीत या फेस्टिवल

फैसले का विरोध करने वाले मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे. जानता हूं कि कैसे-कैसे लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे. मुझे बर्बाद करके रहेंगे. उन्हें जो करना है करें. पर मैं ये करूंगा.

रविवार को जापान से सीधे गोवा पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों को संबोधित करते हुए नोट बंदी पर बात की. उन्होंने कहा, मैंने उस दिन भी कहा था कि इस फ़ैसले से तकलीफ़ होगी, लेकिन मैं आज उन लोगों के सामने सर झुकाता हूं कि हज़ारों लोग पैसों के लिए कतार बनाकर खड़े हैं और हर आदमी ये कह रहा है कि मुसीबत हो रही है, पर इससे देश का भला होगा. मोदी बोले, मुझे बस पचास दिन का समय दीजिए. ये देश वैसा हो जाएगा जैसा आप चाहते थे. अगर उसके बाद मुझमें कोई गलती दिखे तो जो चाहिए सज़ा दें. पीएम मोदी अपनी कथनी को करनी मे बदल गए तो कालेधन वाले बेभाव मारे जाएगे, कितनी खाई होगी हलाल की कमाई हराम की खाने वालों ने कि हिसाब ही नही मिल रहा है. कहा जा रहा है कुछ खास लोगों के साथ-साथ विदेशी कंपनियों को लोन देने और बैंकिंग सेक्टर को मंदी से उबारने के लिए जनता का पैसा जमा करवाने के लिए मोदी सरकार ने यह चाल चली है. जिससे अमीर, अमीर और गरीब गरीब हो जाएगा. यह समझने वाली बात है कि बैंक लोन का पैसा गबन जरूर होता है, लेकिन किसी खाताधारक का पैसा डूबता भी तो नहीं है. पीएम मोदी के विरोध का मतलब है जनता का विरोध. मोदी को जनता ने पीएम बनाया है, नेताओं ने नही. नेता तो बस अपनी काली कमाई का ईमानदारी से हिसाब दे दें बस. जब जनता ने पीएम मोदी की एक पुकार पर अपनी गुल्लके तक फोड दी, तब ऐसे में नेताओं को भी अपनी कमाई का ब्यौरा सार्वजनिक करना होगा. आतंक और आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक के बाद नेताओं और कालेधन वालों की बारी है. क्योंकि प्रधानमंत्री को नरेंद्र मोदी को अगले आम चुनाव मे आना तो जनता के सामने ही है. ब्रिटिशकाल में नमक बनाकर कानून तोडऩा अलग बात थी और मोदी सरकार में नमक को ब्लैक में बेचना अलग. ब्रिटिशकाल में नमक बनाकर कानून तोडऩे का अर्थ था भारत के प्रति नमक हलाली (नमक का हक अदा करना) थी, तो मोदी सरकार में नमक को ब्लैक में बेचना मतलब देश के प्रति नमक हराम. न जाने जनता कब भेड़ जैसी सोच को अपने दिलोंदिमाग से दूर करेगी. फिर ऐसी भी क्या आग लग गई कि एक झटके में 400 रुपए किलो का नमक खरीद लिया. थोड़ा सा भी सब्र नहीं है क्या. रही बात इंडियन करेंसी के बदलने में आ रही दिक्कतों की, तो इस बात को कुछ यूं समझिए कि केदारनाथ में आपदा, भुज का भूंकप या अचानक से भारत-पाक युद्ध के चलते कफ्र्यू जैसे हालात या फिर बरसात की बाढ़ में सब कुछ बह जाना, उन हालातों में जिंदगी क्या रंग दिखाती है, सोच कर भी दिल दहल जाता है. तब ऐसे में तो कुछ भी नहीं हुआ है, सिर्फ करेंसी ही बदली है, सिस्टम को ढर्रे पर आने में कुछ वक्त तो लगता ही है। हां इन घटनाक्रमों से एक बात तो सीखने को मिलती ही है कि इंसान को हमेशा आने वाले समय के लिए तैयार रहना चाहिए. न जाने कब क्या हो जाए, सिर्फ प्लानिंग के आधार पर जिंदगी चला करती तो यूं अचानक मौत न आया करती. आतंक के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक हो या कालेधन के खिलाफ इंडियन करेंसी में बदलाव, दोनों ही मामलों में दर्द सिर्फ उनको ही हो रहा है जिन्होंने गाहे-बगाहे कभी इनका समर्थन किया होगा, आम भारतीय, जो अपने पेट भरने लायक पैसा जुटाने के जुगाड़ में ही दिन गुजार दिया करता हो, उसे क्या फर्क पडऩा है. जब कुआं खोदकर ही पानी पीना है तो डर या चिंता किस बात की. डरे वो जो खजानों पर कुंडली मारे बैठे है. यह मोदी सरकार है जो सांप को मारने के लिए डंडा चलाती है, न कि सांप मरने के बाद। सीधी बात यह है कि काला धन रोकने के लिए 500-1000 की भारतीय मुद्रा को अचानक से अमान्य घोषित करने की बात हो या फिर सर्जिकल स्ट्राइक का मामला आम भारतीय के लिए थोड़ा तकलीफदायक जरूर रहा, लेकिन सुकून भरा ही कहा जाएगा. दिक्कत राजनीति क विरोधियों को ही हो रही है. जो नोटबंदी के सवाल पर मोदी सरकार कटघरे में खड़ा करते हुए कुछ दिनों की मोहलत मांग रहे है. जिनका मकसद सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध करना है. हां नोटबंदी पर कुछ खामियां है, लेकिन जब लक्ष्य बड़ा हो तो छोटी-छोटी समस्या को दरकिनार किया जा सकता है. इस फैसले के दूरगामी परिणाम सुखद होंगे लेकिन वर्तमान में कष्टदायक तो है ही. बैंक एकाउंट में पैसा जमा है, पर मजबूरी यह कि 500-1000 का नोट बंद होने के चलते दुखी है, लेकिन फिर भी आम जनता जहां पैसा जमा करवाने या बदलवाने के काम को एक फेस्टिवल के रूप में एंज्याय कर रही है, वहीं पैसे की जमाखोरी करने वालों का दिन भी काला ही साबित हो रहा है.

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