शैतान विद्वान

05 दिसम्बर 2016   |  विजय कुमार शर्मा   (109 बार पढ़ा जा चुका है)

एक समय की बात है कि एक राज्य को भयंकर मूसीबतों ने घेर लिया। पुराने जमाने के राजाओं के लिए अपनी प्रजा का दुख देखा नहीं जाता था। इसलिए वह राजा जी जान से अपने राज्य की समस्याओं हो हल करने में जुट गया। राजा भेस बदलकर रात को निकलता और दिन में अपने दरबारियों के साथ विचार विमर्श में व्यस्त रहता। साथ ही साथ वह इस प्रयास में भी रहता कि उसे कोई एक विशेषज्ञ मिल जाए जिसके पास राज्य की समस्याओं को हल करने का फार्मूला हो। राजा के यकीन अनुसार उसे एक विशेषज्ञ मिल भी गया जिसने दावा किया कि उसके पास राज्य की समस्याओं का हल है। मगर यह कैसे पता चलता कि वह वास्तव में बुद्धिमान है या कोई पाखंडी, शैतान या बहरुबिया। राजा ने एक दिन अपने राज्य के सबसे बुद्धिमान दरबारी आचार्य को उसकी बुद्धी की परीक्षा लेने को भेजा। बुद्धिपरीक्षा हेतु जब आचार्य परीक्षा स्थल पहुंचे तो उस बहरुबिए ने सोची समझी साजिश के तहत अपने भक्तों तथा अनपढ़ों का झुंड इकट्ठा कर रखा था। परीक्षा शुरु होते ही आचार्य जी बोले --- उचरो ? बहरुबिए की से उत्तर आया उचरो-मुचरो-घुचरो। आचार्य हैरान और परेशान ! कुछ संभलकर बोले ऐकी ! बहरुबिया ऐकी-नेकी-ढेकी। आचार्य जी फिर हैरान परेशान ! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उससे बात क्या की जाए। इतने में झुंड ने बहरुबिए शैतान को उठाया और दरबार में पहुंचकर राजा के ध्यान में लाए कि यह तो आपके आचार्य के एक-एक प्रश्न के तीन-तीन उत्तर दे रहा था। यह बहुत ही बुद्धिमान है इसलिए इसे प्रधानमंत्री बनाया जाए। प्रजा का हुक्म सर माथे पर मानते हुए उसे प्रधानमंत्री बना दिया गया। हालात सुधरने की बात तो छोड़िए बद से बदतर होने शुरु हो गए। जनसमर्थन का लाभ उठाकर शैतान विशेषज्ञ लगा जमकर भ्रष्टाचार करने। उसके पक्ष में जनसमर्थन को देखते हुए राजा के लिए उस के खिलाफ कार्रवाई करना भी आसान नहीं था। इसलिए दरबारिओं की सलाह पर उसे समंदर मंत्री बनाकर समुंद्र के किनारे समुंदर की लहरें गिनने के लिए बैठा दिया गया। लहरें गिनना तो दूर उसने वहां से गुजरने वाले देशी विदेशी जहाजों से गैरकानूनी करों की वसूली करनी आरंभ करदी । फिर दरबार में मशविरा हुआ और उसे घोड़शाला में घोड़ों की लिद तोलने का मंत्री बना दिया गया। वहां भी उसने अपना रंग दिखाना आरंभ कर दिया। पहले दिन की लिद को तोलकर अलग किया। दूसरे दिन भी वही हुआ। जिस दिन लिद कम निकली उसी दिन उसने घोड़शाला के सभी अधिकारिओं/कर्मचारिओं को लाइन में लगा लिया कि आज लिद कम क्यों है। इसका मतलब यह हुआ कि आपने घोड़ो को कम खिलाना आरंभ कर दिया है। अधिकारिओं/कर्मचारिओं ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए उसे पैसे देने आरंभ कर दिए। घोड़े जब कमजोर होना आरंभ हुए तो खबर राजा तक पहुंचना लाजमी था। असहाय राजा को उस शैतान को उसकी कुर्सी वापस देनी पड़ी और प्रजा का हाल बद से बदतर। बेकारी, बदहाली, भूखमरी, हाहाकार मगर उसे हटाना किसी की बस में नहीं रहा। आखरी सहारे के रुप में भगवान की शरण लेना ही उनके लिए आखिरी विकल्प था।

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