जय पताका ले चढ़ा

07 दिसम्बर 2016   |  डॉ. शिखा कौशिक   (208 बार पढ़ा जा चुका है)

त्याग कर सारी निराशा

दृढ़ मनोबल से बढ़ा,

तब पराजय के शिखर पर

जय पताका ले चढ़ा !

………………

थी कमी प्रयास में

आधे - अधूरे थे सभी,

एक लक्ष्य के प्रति

आस्था न थी कभी,

अपनी ही कमजोरियों से

सख्त होकर मैं लड़ा !

तब पराजय के शिखर पर

जय पताका ले चढ़ा !

……………

असफल होकर बहाये

जो भी अश्रु आज तक,

थी मेरी ही मूर्खता

आरंभ से ले अंत तक,

असफलता से सबक ले

पाठ जय का जब पढ़ा !

तब पराजय के शिखर पर

जय पताका ले चढ़ा !

…………..............

है असंभव कुछ नहीं

सही दिशा में यत्न हो,

हो अगर निश्चय हमारा

कंकणें भी रत्न हो ,

आग की लपटों में तपकर

जो बना पक्का घड़ा !

तब पराजय के शिखर पर

जय पताका ले चढ़ा !!


शिखा कौशिक नूतन

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जीवन को सकारात्मकता की ओर मोड़ती एक सुन्दर रचना .

प्रदीपः
11 दिसम्बर 2016

आशावाद उत्तम

सुपर जवाब

प्रेरक अभिव्यक्ति

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