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देश बेंच के खा डाला है नेता और दलालों ने

9 दिसम्बर 2016

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देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ।

जनता के घर डाका डाला

मिलकर नमक हरामों ने ।

खादी टोपी बर्बादी की

बनी आज परिचायक है ।

चोर उचक्के आज बन गए

जनता के जन नायक हैं ।

गाली – गोली किस्मत अपनी

जीवन फँसा सवालों में ।

देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ।


सरकारी जोंकें चिपकी हैं

लोकतन्त्र के सीने में ।

मज़ा आ रहा है उनको

ख़ून चूस कर पीने में ।

औषधि अभाव में हिन्द

तड़प दम तोड़ रहा ।

अमृत दाता ही समाज में

देखो विष को घोल रहा ।

विवश दुधमुंहें गरलपान को

उन्नत देश ख़यालों में ।

देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ।


रथ विकास का बन विनाश

अब दौड़ रहा ।

चढ़कर इस पर सत्ता धारी

सुख वैभव सब लूट रहा ।

श्वेतवसनधारी भारत में

भाग्यविधाता दिखता है ।

राजनीति के मक़तर में

रथ का घोड़ा कटता है ।

तारकोल सड़कों का चाटा

चाराखोर दलालों ने ।

देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ।


विष की खेती आज हो रही

राजनीति के खेतों में ।

मेढ़ों पर सिर कटते हैं

जंग हो रही बेटों में ।

संतापित हैं तप्त हृदय

बेचारी सी माताओं के ।

दिशहीन संतति चंगुल में

फंसी आज नेताओं के ।

मधुरिम मधुमय देश बेचारा

तड़प रहा है तालों में ।

देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ।


हिन्द फंसा गुर्बत में देखो

कौम दीखती अन्धी है ।

अन्तस में है घोर हलाहल

नफ़स ख़लिश है मज़लिश में ।

क़तरा – क़तरा लहू जिस्म का

रंगा सियासी रंगों में ।

अलबत्ता इन्सान आज का

फंसा सियासी फन्दों में ।

अनुराग तड़पता द्वेष ईर्ष्या

के चमकीले जालों में ।

देश बेंच के खा डाला है

नेता और दलालों ने ॥

उमेश शर्मा

उमेश शर्मा

अति-सुन्दर राघवेंद्र कुमार जी , साधुवाद.

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राघव का रचना संसार : कुछ कविताएँ और कुछ लेख
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प्रियतम की याद

30 अक्टूबर 2015
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प्रियतमकी यादपीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।दुःख का सागर धैर्य खो रहाव्यथा की सरिता उमड़ रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।अक्स तुम्हारा मुझ में बसताऔर हमारी साँसें तुझ में ।आह तुम्हारी मेरे प्रियतमबन शूल हृदय को छेद रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनय

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प्रियतम की याद

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प्रियतमकी यादपीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।दुःख का सागर धैर्य खो रहाव्यथा की सरिता उमड़ रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।अक्स तुम्हारा मुझ में बसताऔर हमारी साँसें तुझ में ।आह तुम्हारी मेरे प्रियतमबन शूल हृदय को छेद रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनय

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प्रियतम की याद

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प्रियतमकी यादपीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।दुःख का सागर धैर्य खो रहाव्यथा की सरिता उमड़ रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनयन नीर बन फूट रही है ।अक्स तुम्हारा मुझ में बसताऔर हमारी साँसें तुझ में ।आह तुम्हारी मेरे प्रियतमबन शूल हृदय को छेद रही है ।पीर तुम्हारे हृदय की प्रियतमनय

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आप के आशीर्वाद का आकांक्षी... http://www.unvanprkashan.com/details.php?book=28

22 अक्टूबर 2016
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