गज़ल

16 दिसम्बर 2016   |  देवेन्द्र उत्कर्ष   (183 बार पढ़ा जा चुका है)

भूखे पड़े दशकों से मगर आश नही है।
बेबस को लिबासों का भी अहसास नही है।।
आफत में जान पड़ गई इक बूँद के बगैर
कैसे कहूं कि आज मुझे प्यास नही है।।
छाई घटा काली थी बहारों से पूंछकर
तारों नेकहा, आज तो कुछ ख़ास नही है।।
देखा तुम्हे मायूस तो कलियाँ चहक उठी
दिल आइने में देख ? क्या उदास नही है।।

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बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

आपका आभार

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