गज़ल

17 दिसम्बर 2016   |  देवेन्द्र उत्कर्ष   (109 बार पढ़ा जा चुका है)

भरे अरमानों पे छाई घटा काली -सी है।
जिंदगी देखिये दस्तूर निराली-सी है।।
मिठास मिल सका न अब तलक हमे साकी
देगा तू जाम कहाँ ;टूटी पियाली -सी है।।
टूटे थे ख्वाब मनाया बहुत मातम हमने
देखिए उनके यहाँ आज दिवाली -सी है।।
चढ़ा सियासी रंग रोज मच रहा हल्ला
देखो!क्या शहर में चुनाव की लाली -सी है।।
-देवेंद्र उत्कर्ष

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