था मुक़द्दर में जो भी मिला आज तक

26 दिसम्बर 2016   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (125 बार पढ़ा जा चुका है)

था मुक़द्दर में जो भी मिला आज तक

था मुक़द्दर में जो भी मिला आज तक,

यूँ ही चलता रहा सिलसिला आज तक।


बर्फ पिघलेगी ज़िद की किसी रोज तो,

ना बिखरने दिया हौंसला आज तक।

कोशिशें आँधियों ने बहुत की मगर,

मैं बुझा ही नहीं यूँ जला आज तक।

वक़्त लेता रहा करवटें रात -दिन,

पर उम्मीदों का घर ना मिला आज तक।


लौट आये सभी भूले भटके हुए,

क्यों भटकता रहा काफिला आज तक।


हम निकल आये किस रास्ते ज़िन्दगी,

मंज़िलें खो गईं मैं चला आज तक।

दिल के रिश्तों पे कुर्बान हम हो गए,

उनके दिल से गया ना गिला आज तक।


ना रुका ना थका आगे बढ़ता रहा,

फिर भी तय ना हुआ फासला आज तक।


भूल करदी मुहब्बत का दम भर लिया,

आप कर ना सके फैसला आज तक।


हो गए खंडहर जो बुलंदी पे थे,

टिकता 'अनुराग'कैसे किला आज तक।

अगला लेख: आँधियों से हमें तुम डराओगे क्या



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x