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तकरार नहीं, मंथन की जरुरत

31 दिसम्बर 2016   |  हरीश भट्ट
 तकरार नहीं, मंथन की जरुरत

मुद्दों से भटकना और भटकाना राजनेताओं की फितरत है. जनतांत्रिक व्यवस्था में मजबूत विपक्ष न हो तो सत्ता निरंकुश हो जाती है. ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था के मायने ही बदल जाते हैं. लेकिन, इससे भी ज्यादा बदतर हालात तब होते हैं, जब पक्ष और विपक्ष में जनहित के मुद्दों के बजाय व्यर्थ की बहस-बाजी में वक्त जाया कर दिया जाता है.

वर्तमान में विमुद्रीकरण के दौर में पक्ष की दृढ़ इच्छाशक्ति और विपक्ष के बचकानेपन के कारण संसद सत्र का बेशकीमती समय और संसद की कार्यवाही में करोड़ों की धनराशि यूं ही बर्बाद हो रही है. जबकि, आम जनमानस को अपने जनप्रतिनिधियों से हद से ज्यादा उम्मीद थी, कि इस बार तो कोई सार्थक हल जरूर निकलेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. महत्वपूर्ण समय यूं ही फिजूल के हो-हल्ले में गुजर गया.

चलिए मान लेते हैं मुद्रा बदलाव के दौरान हुई मौतों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हंै, तो फिर 1947 के विभाजन में हुए भीषण नरसंहार और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हजारों निर्दोष सिखों की हत्या के साथ-साथ कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के लिए कांग्रेस को क्यों नहीं जिम्मेदार माना जाता ? रही बात धनकुबेरों की तो अंबानी, अदानी, सिंघवी, टाटा, बिरला, माल्या, ललित मोदी पिछले ढाई सालों में तो अरबपति बने नहीं.

राहुल गांधी बात करते हैं कि देश की जनता पढ़ी-लिखी नहीं है, तब ऐसे में नरेंद्र मोदी का डिजिटल इंडिया का सपना कैसे पूरा होगा ? जबकि, इस बारे में राहुल गांधी कांग्रेसी दिग्गजों से सवाल-जवाब करते तो ज्यादा अच्छा होता. वह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सवाल करते, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से सवाल करते कि भारतीय अनपढ़ों को साक्षर बनाने के लिए कांग्रेस ने दस सालों में ठोस उपाय क्यों नहीं किए. जबकि, उनके पिताजी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ही भारत में कम्प्यूटर क्रांति का जनक माना जाता है. उससे पहले उनकी दादी इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू करके जनसंघ की कमर ही तोड़ दी थी. लेकिन, फिर भी ऐसा क्या हुआ कि जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के रूप में देश की सत्ता पर काबिज हो गया. कांग्रेस ने लगभग 60 सालों में विकास की मूल अवधारणा के संबंध में ढुलमुल रवैया क्यों अपनाकर रखा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल-जवाब करने के बजाय राहुल गांधी को कांग्रेस दिग्गजों को ही लाइन में खड़ा कर देना चाहिए, कि बताइए ऐसा कैसे हो गया, कि जिस कांग्रेस ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, जो हाथ का निशान जन-जन की पहचान था. वह अचानक से कैसे आमजन से कट गया. जबकि, ढाई साल पहले तक दुनिया के दिग्गज अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दस साल तक प्रधानमंत्री पद को संभाला है. राहुल तो बच्चे हैं, लेकिन पुराने घाघ कांग्रेसियों को जवाब देना ही चाहिए. कांग्रेसी दिग्गजों का घाघपन देखिए कि नोटबंदी के दौर में वल्र्ड के पॉवरफुल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी को कमान सौंप दी.

बात की जा रही है कि प्रधानमंत्री मोदी राहुल के सवालों के जवाब देने की बजाय उनका मजाक उड़ा रहे हैं. अंतर सिर्फ सोच का है कि कांग्रेस के युवराज का मजाक पीएम नहीं, बल्कि खुद कांग्रेसियों ने ही बना रखा है, कांग्रेस के थिंक टैंक को देश के वर्तमान हालात पर ईमानदारी से मंथन करना होगा. फिजूल की बहसबाजी से कुछ होता तो प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा लच्छेदार भाषा में कौन सा प्रधानमंत्री जनता से संवाद कर सकता है. जवाब होगा, कोई नहीं. देश के विकास में कांग्रेस के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. देश की वर्तमान हालत के लिए कांग्रेस उतनी ही जिम्मेदार है, जितना कि वह देश के विकास के लिए खुद को श्रेय देती है. कांग्रेसियों के समझदार दिग्गजों को मानना होगा कि नोटबंदी के दौर में बैंककर्मियों और अधिकारियों की नियुक्तियां पिछले ढाई साल में नहीं हुई हैं. व्यक्तित्व के आधार पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी में जमीन-आसमान का अंतर है. नरेंद्र मोदी जनतंत्र तो राहुल गांधी राजतंत्र के द्योतक है. तब ऐसे में मोदी-राहुल की तुलना कहां तक जायज है ? आज कांग्रेसी जितनी ईमानदारी से अपने और जनता के अधिकारों की बात करते हैं, अगर इससे आधी ईमानदारी से उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो अच्छे दिनों के इंतजार में बुरे दिन न देखने को मिलते.

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