कुछ नहीं बदला : सूरजप्रकाश राठौर

06 जनवरी 2017   |  अनवर सुहैल   (363 बार पढ़ा जा चुका है)

हाल ही मेंबोधि प्रकाशन से अनवर सुहैल का कविता संग्रह "कुछ भी नहीं बदला"प्रकाशित हुआ. यह पुस्तक विश्वास के दो दशक श्रृंखला की पांचवी कृति है. इस संग्रह में 86 कविताएं है .सुहैल जी ने इस संग्रह को फेसबुक के कविता प्रेमी मित्रों को समर्पित किया है.इसका मूल्य 120 रूपये है. यहां बाजार में स्त्री, मैं बाबा नागार्जुन को खोज रहा हूं, हम नहीं सुधरेंगे,तो कहां है बसंत, आभामंडल, दुख सहने में अभ्यस्त लोग, कैसे समझाए तुम्हें, मजदूर दिवस जैसी महत्वपूर्ण कविताओं के माध्यम से समय समाज, कवि की दृष्टि ,उनके मनोवि ज्ञान को समझा परखा जा सकता है. श्रम औऱ श्रमिकों के बीच बहुत समय गुजारने के कारण कवि उनके कष्टों से अवगत है.वे ,आमजन की पीड़ा पर सहानुभूति के मरहम लगाकर उन पर राजनीति करने वालों को भी पहचानते है (मजदूर दिवस)उन आफिसरों पर भी प्रकाश डालते है जो मजदूरों को ,अपने अधिनस्थों को आत्मरंजना के घूंट पिला पिला कर शोषण करते है औऱ प्रमोशन लेकर खिसक लेते है.(उसके कहने पर)मुसलमानों के प्रति जल्लादी सोच रखने वालों पर बड़ी सहजता से किंतु झुब्ध होकर लिखते है..ये तो अच्छा हुआ/तुम मियां नहीं हो/वरना ज्यादा देर नहीं लगता/हिसाब चुकता करने में....(भाग्य विधाता)इसी तरह(माफी मांगना होगा)अभिजातीय औऱ विनाशकारी, षणयंत्रकारी सोच रखने वाले कुकर्मियों पर कई कविताएँ लिखी गई है.मौत के सौदागरों पर(वर्दियां हथियार औऱ अमन चैन)(ओ तालिबान)माल्थस का भूत इत्यादि... माल्थस के भूत की निम्न पंक्ति कितनी चिंता पैदा करती है.देखिये एक जनप्रतिनिधि की सोच-..एक जान के पीछे पांचे लाख ना/कौन जेब से निकालकर देना होगा... भविष्य के प्रति आशा ली हुई कुछ कविताएं हैं. परिवर्तित होते विचार रखने वालों पर कुछ कविताएं है (कैसे समझाऐ तुम्हें,जनरेशन गैप,असमानता)कवि को,चिंता है कि आने वाली पीढी मानवीय औऱ नैतिक मूल्यों को कैसे संरक्षित रख पाऐंगीे,रख पाएंगी भी की नहीं... पिता की सीख, अम्मा का चश्मा, औऱ मतदाता जैसी कविताएं मनुष्य के ,कवि के भीतर की पूंजी है. मां के प्रति बहुत कुछ ना कर पाने की पीड़ा, जमाने को जानते हुए भी बच्चों को समझाने का यत्न, सब कुछ जानकर जनता को मत डालने ,देश द्रोहियो को जिताने औऱ खुद हार जाने का अफसोस.. इतनी बड़ी दुनिया में कवि के भीतर के मनुष्य को खोजना होता है ऐसे लोगों को जो हरखू लोहार, अध्ययन अध्यापन मे जी डाल देते शरमा जी को जानते हो ,समझते हो . कवि तथाकथित साहित्यकारों (खाए पीए अघाए)के बीच बाबा नागार्जुन जैसे चरित्रो को तलाशते है.दुखों के पत्ते, इत्यादि, वे लोग, यकीन, आमजन, जैसी कविताएं आम अवाम की जिन्दगी का फलसफा है.रातदिन हाड़मांस पेराने के बाद असल जीवन औऱ जगत से सदा उपेक्षित रह जाता है. हमारी आदत है यह कहने का कि वे सब दुख मे रहने को अभ्यस्त है..दुख में रहना मनुष्य की प्रवृत्ति कैसे हो सकती है .कोई भी दुख के साथ जीवन निर्वहन नहीं करना चाहता भले ही वह जीवन का कितना ही बड़ा उपादान क्यों ना हो-जिंदगी के दरख्त पर/दुखों के पत्ते कितने ज्यादा/औऱ सुख के फूल कितने कम..(दुक्खों के पत्ते)लड़ भी तो नहीं सकते/भगा दिया गया तो/डूब जाएगी तीन माह की मजूरी..(मजदूर दिवस)औऱ मतदान के बाद/फिर हो जाता है वो/घूरे का घूरा/आधा अधूरा...(आमजन)हम नहीं सुधरेंगे,औऱ यकीन हम पर हजारों सालों से लादी गई ब्यबस्था की परिणति है हमे ं अपने कुएं के भीतर रहने हेतु हठ बना दिया है.हमें अपने कष्टों औऱ शोषणौ के साथ ही यह जीवन सरल लग रहा है रसासिक्त लग रहा है.कुछ भी नहीं बदला काव्य संग्रह का शीर्षक है.कवि इस माध्यम से समाज के सर्वहारा पर सामाजिक दबाव का चित्रण किया है.स्त्री देह स्त्री समाज के मूलभूत पीड़ा को अभिव्यक्ति देती है.स्त्री देह जहाँ सृजन का मूल स्त्रोत है वही स्त्री जीवन का अभिशाप भी. हमारा पुरूष वर्ग कमोबेश देह से आगे सोच नहीं पाता. उन्हें यह काम की मशीन मात्र दिखाई देता है... तुम्हारे साथ रहते हुए/हमें क्यों महसूस होता है/कि तुम मकान मालिक हो/औऱ हम अनुबंधित किरायेदार...(अल्प संख्या या स्त्री)कि वस्तु का कोई मन नहीं होता/कि पसंद का अधिकार/खरीददार की बपौती है/कि दुनिया एक बाजार ही तो है/फिर वस्तु की इच्छा अनिच्छा कैसी....(बाजार में स्त्री)सचमुच स्त्री को घर की मान मर्यादा मान कर उसे चहारदीवारी में कैद कर दिया गया. उसे स्वच्छंद जीवन से बिदार दिया गया. उसकी रक्षा न कर जिंदा जलाया गया. पूजा की सामग्री बना डाला. सभ्य होने के नाम पर बाजार के विग्यापन की वस्तु बना दी.समाज के अन्य पहलुओं में भी बदलाव नहीं आया जैसे अंधविश्वास, गुन्डागर्दी,हवस लालच नफरत.सारी चीजें हमारे भीतर से किंचीत भी कम नहीं हुआ. कवि गहरी सोच को कविता मे ढालते है.विषय केभीतर प्रवेश कर कठिनाइयों का बोध करते है.लोक की समस्या उनकी पीड़ा उन्हें सालती है.कोयला खदान के करमचारियों के बहाने उनके आपसी कार्यभेद को अनुभूत करते है.बेटियों के बहाने नए भविष्य, नए भारत, वर्गहीन समाज धरती पर उतार पाने के प्रति आशान्वित होते है कविता की कहन शैली संवाद की है. पाठक को पूछते औऱ बताते, राय मांगने की शैली है.पहाड़ ,पर्वत, चांद, तारे, समुद्र के बिम्बों का गुम्फन नहीं है.कहानियां गढ़कर विचार रखने का ग्यानवितरण भी नहीं हैं. सरल एवं छोटी छोटी पठनीय कविताएँ है.समाज के हेतु के लिए तपश्चर्या हेतु तहे दिल से कवि को आभार... सूरज प्रकाश

suraj prakash rathaud

अगला लेख: अंतिम आदमी की पीड़ा : गणेश गनी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x