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तत त्वम् असि

21 जनवरी 2017   |  देवेन्द्र प्रताप वर्मा

तत त्वं असि

रोज की तरह सब काम काज समेट ऑफिस से घर पहुचा कि चलो भाई इस व्यस्त भागदौड़ की जिंदगी का एक और दिन गुजर गया,अब श्रीमती जी के साथ एक कप चाय हो जाये तो जिंदगी और श्रीमती जी दोनों पर एहसान हो जाये।खैर ख्यालों से बाहर भी नही आ पाया था कि श्रीमती जी का मधुर स्वर अचानक कर्कश हो गया अजी आपका ध्यान किधर है,इतनी देर से फ़ोन बज रहा है आप उठाते क्यों नहीं हैं,और हाँ अगर ऑफिस से बड़े साहब का फ़ोन हो तो मुझे दो मै बात करती हूँ कि शाम के 6 बज चुके है अब तो मेरे पतिदेव को बक्स दीजिये,ये कौन सा काम है जो ख़त्म ही नहीं होता है, और जब घर पर भी ऑफिस का काम करना है तो घर आने ही क्यों देते है... अब छोडो भी.... एक रिपोर्ट भेजनी थी, दो मिनट का काम है, शायद उसी के लिए फ़ोन कर रहे हैं॥ मैं भेज देता हूँ,..ख़बरदार .....जो कंप्यूटर को हाथ लगाया, मै कह देती हूँ, तुमसे कभी बात नही करुँगी जो मेरे हिस्से का वक़्त तुमने ऑफिस के फालतू के काम में गंवाया तो हां.....फालतू का काम!! फालतू का काम नही है.. बहुत जरुरी रिपोर्ट भेजना है, मुझे भेज लेने दो फिर जैसा तुम कहोगी मै वैसा ही करूँगा,...और कोई चारा न देख मैंने वो ही कह दिया जिसका वो इंतेजार कर रही ही..अच्छा ठीक है॥ जल्दी से भेजो जो रिपार्ट- सिपोर्ट भेजनी है, मै चाय लेकर आती हूँ और विस्मयकारी मुस्कान लिए किचन की ओर चली गई।...मै निरपराध अपराधी सा, कंप्यूटर के कीबोर्ड पर खेल कूद कर आखिर में आराम से बैठ श्रीमती जी का इंतजार करने लगा। श्रीमती जी मुस्कुराती हुई चाय लेकर आई,उनकी मुस्कुराहट देख अनायास ही मुझे पुराणों का स्मरण हो आया कही ऐसा न हो आज देवराज इंद्र का इंद्रासन ही न छिन जाये,आखिर वचन में जो बंध गए है ,वो भी एक स्त्री के,जिसके लिए महाराज दशरथ ने श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास दे दिया था। डरो मत ....तुम्हारा एटीएम कार्ड नही मांगूगी और न ही शॉपिंग पे ले चलूंगी,बस.. मेरे हिस्से का जो वक्त तुमने अपने ऑफिस को दिया है उसमें से बस एक दिन उधार दे दो और कल ऑफिस से छुट्टी ले लो कहीं बाहर चलते हैं किसी नदी के किनारे... जहाँ बस हम तुम हो और कोई न हो... ओह बस इतनी सी बात ...मैंने राहत की सांस ली..चलो अच्छा ही है। इसी बहाने सही कुछ समय,हौदेश्वर नाथ धाम (प्रतापगढ़ जनपद के कुंडा तहसील में गंगा नदी के तट पर स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर) में बिताते है जहाँ मंदिर की सीढ़ियां पर बैठ गंगा माँ के दर्शन भी हो जाएंगे और तुम्हारी इच्छा भी पूरी हो जायेगी, और कुछ पल समय की कैद से निकल स्मृतियों के महल में सुरक्षित हो जाएंगे। गंगा नदी के तट पर शिव मंदिर से उठती घण्टा ध्वनि, धीमे सुनाई पड़ते मंत्रो के स्वर ,पछियों का कलरव और गंगा की लहरों पर वायु एवं जल के घर्षण से उत्प्न्न ध्वनि और इन सब के मध्य बेहद सादगी में,श्रीमती जी का सानिध्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो विभिन्न रंगों से सजे किसी अधूरे दृश्य को पूर्णता मिल गई हो कुछ अधूरा सा जिसे आंखे देखना चाहती थी किन्तु उस भागदौड़ वाली जिंदगी में देख नहीं पा रही थी। श्रीमती जी अपने मधुर स्वर में कुछ अतीत के पलों का स्मरण कराती रही और मै उनके मुखड़े को निहारता उस पूर्णता के अनुभव में डूबा रहा कि अचानक फिर से उनका कर्कश स्वर सुनाई दिया ऐसा लगा मानो...मानो !! ..वीणा के तार बजते बजते टूट से गए.. कहाँ खोये हो तुम??? मै इतनी देर से बक बक किये जा रही हूँ और तुम कुछ बोल ही नही रहे हो ...कहाँ खोये हो तुम ..कहीं फिर से उस लड़की के खयालो में तो नही... जिसका नींद में तुम नाम लेते हो..नींद में भी मैं तुम्हारा ही नाम लेता हूँ, अपनी सहपाठिनी कामिनी का स्मरण करते हुए मैं कुशलता पूर्वक सम्हला, मैं तुम्हारी ही सुंदरता को निहार रहा था। प्रिये मै उसी में डूबा हुआ था, तुम भी कहाँ बेवजह कामिनी का नाम ले लेती हो । कामिनी ....ये कामिनी कौन है ..मैंने उसका नाम कब लिया ???सच सच बताओ ये वही ख्वाब वाली लड़की है ? नही भाई मेरी कामनाओं की स्वामिनी मेरी कामिनी तुम्ही तो हो तुम्हारे सिवा अन्य कोई कामिनी वामिनी नही है,मेरा यकीन करो,मैंने उसे बहलाने का सफल प्रयास किया।अच्छा ये सब छोडो चलो अब मुझे अपनी लिखी कोई कविता सुनाओ वो भी गाकर, तरन्नुम के साथ।कविता सुनाने तक तो ठीक था, पर गाकर तरन्नुम के साथ,घाट पर और भी लोग थे और उनके मध्य मेरा गीत कही उनके संगीत प्रेम को आघात न पंहुचा दे,खैर मैंने समझाया देखो प्रिये मेरा गीत घर पर सुन लेना तुम लता जी कोई कोई गाना बजा लो न मोबाइल पर ।मेरे मोबाइल में गाना कहाँ बजता है।अरे काहे नही बजता ! स्मार्ट फोन जो मैंने उपहार में दिया था, उसमें में सुनो न पुराने वाले नोकिया 1100 को छोड़ो...कैसे छोड़ दूं ..मेरी माँ ने दिया है। अच्छा ठीक है ...मत छोड़ो.. पर स्मार्टफोन में बजाओ.. न । नही चलेगा !!क्यों ??? मोबाइल की बैटरी डाउन है।ओह ये मोबाइल भी कम्बख्त !!..बैटरी धोखा दे गई।तुम अपने मोबाइल की बैटरी इसमें लगा दो न ...तुम्हारा मोबाइल तो चार्ज है न.. श्रीमती जी बोली।अरे मेरे मोबाइल की बैटरी इसमें नही लगेगी।क्यों नही लगेगी ?अरे ! कैसे समझाऊं तुमको दोनों मोबाइल अलग अलग है,बैटरी फिट नही हो पायेगी इसका आकार कुछ बड़ा है।अगर आकार बराबर होता तो क्या तुम्हारी बैटरी इसमें लग जाती ? हाँ लग जाती ।...पर अभी तो तुमने कहा कि दोनों मोबाइल अलग अलग है फिर तुम्हारे मोबाइल की बैटरी मेरे मोबाइल में कैसे काम करेगी??..ओह तुम भी कहां मोबाइल और बैटरी के चक्कर में फंस गई।नही मुझे समझाओ पहले। ...ऐसे समझो कि मोबाइल फोन अलग -अलग होते है। किसी में गाना सुना जा सकता है, तो किसी में गाने सुनने के साथ ही साथ उसे देखा भी जा सकता जैसा कि तुम्हरा स्मार्टफ़ोन ..और किसी में केवल बात हो सकती है , न ही गाने सुने जा सकते हैं और न ही देखे जा सकते है जैसे की नोकिया 1100... सबकी रचना अलग अलग है या यूँ समझो कि सबके कार्यों की सीमाएं अलग -अलग है ..जैसे की आंख देख सकती है लेकिन सुन नही सकती, कान सुन सकता है लेकिन देख नही सकता।..इतना तो मैं भी जानती हूँ इसमें नया क्या है। बताता हूं ....अब बैटरी का विचार करो।बैटरी ऊर्जा का स्रोत है, सभी तरह के मोबाइल फ़ोन में एक सा ।नोकिया 1100 की बैटरी की ऊर्जा और तुम्हारे स्मार्टफोन की बैटरी की ऊर्जा में कोई अंतर नही है।दोनों बिलकुल एक जैसे हैं ।कोई अन्तर नही है।बैटरी मोबाइल की जान है । बैटरी को हटा देने से मोबाइल का कोई अर्थ नही है फिर वो चाहे नोकिया 1100 हो या फिर तुम्हारा आधुनिक स्मार्टफोन सब बेकार है किसी काम के नही बैटरी के बिना।मतलब असली चीज बैटरी है। सही समझी।असली चीज बैटरी अर्थात ऊर्जा है । हाँ तुम सही कहते हो अब मै समझी असली चीज बैटरी है।हाँ। उसकी हाँ सुन मुझे लगा कि शायद मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो गई अब मैं मोबाइल और बैटरी के बंधन से मुक्त हो गया पर अचानक उसने अगला प्रश्न कर दिया अगर असली चीज बैटरी है तो फिर मोबाइल क्या है।और उसकी जरुरत क्या है।मोबाइल की जरुरत इसलिए है ताकि तुम लता जी का गाना सुन सको। तो मै कौन हूँ और मै गाना क्यों सुनना चाहती हूँ ।आखिर कौन हूँ मैं??मेरा सिर घूम गया और मेरे मुख से अचानक ही फूट पड़ा... तत त्वम् असि।


देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत"

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