कैसे इतनी हिम्मत हो जाती है किसी महिला को छेड़ने की. ?

25 जनवरी 2017   |  धर्मेंद्र राजमंगल   (81 बार पढ़ा जा चुका है)




अभी कुछ दिन पहले ही बैंगलूरू की छेडछाड वाली घटना देखी। दो लडके स्कूटर पर एक लडकी का पीछा करते हुये उसके पास आये और उनमें से एक ने स्कूटर से उतर कर उस लडकी को छेडना शुरू कर दिया। जब उस लडकी के सामने उसकी पेश न गयी तो उसे जमीन पर धक्का मार भाग गये।
ये घटना उस जगह हुई जहां से कुछ दूरी पर ही उस लडकी का घर था। कमाल की बात तो यह थी कि उन लडकों की इतनी हिम्मत हो गयी कि वे उस लडकी का पीछा करते हुये उसके घर के करीब तक आ पहुंचे और उसके साथ मनमानी करने की भी कोशिश की।
ये घटना उस जगह की है जिसे तकनीकि का हब कहा जाता है। जहाँ सबसे ज्यादा शिक्षित और विकसित सोच के लोग रहते हैं। जहाँ रात रात भर लोग काम करते हैं और कुछ महिलायें और पुरूष आधी रात को काम कर घर लौटकर आते है। फिर उसी जगह ये घटना होना?
कहाँ से आती है इतनी हिम्मत इन उद्दंड लडकों में? कहीं इन सब के साहस को बढाने में महिला सुरक्षा के प्रति शासन का ढुलमुल रवैया तो नही? या फिर उन लोंगों की सोच और वयान जो कहते हैं कि लडकों से गलती हो जाती है। या फिर उन लोगों के विचार जो कहते हैं कि लडकियों को देर रात तक घर से बाहर नही रहना चाहिये। लडकियों को छाटे कपडे नही पहनने चाहिये। लडकियों को शाम ढले अकेले कहीं जाना आना नही चाहिये।
कुछ लोग तो ऐसे रास्तों को दोष देने लगते हैं जहाँ इस तरह की घटनायें हो जातीं हैं। हम रास्तों को दोष देने की वजाय उन लोगों का पूरा का पूरा दोष क्यों नही मानते जो इसके लिये जिम्मेदार हैं या जिन्होंने ऐसा किया। ये सब बातें असल वजह को छुपाने के लिये होती हैं। जब अपराध किसी व्यक्ति द्वारा किया गया तो रास्ते का दोष कैसे हो सकता है?
हल ये नही है कि महिलायें ऐसे रास्ते पर न जायें, होना ये चाहिये कि महिलायें ज्यादा से ज्यादा ऐसे रास्तों पर जायें और अधिक संख्या में जायें। रात में महिलायें क्यों न बाहर निकलें? रात में तो उन लोगों को बाहर नही होना चाहिये, जो इस तरह की हरकतें करते हैं। और रात में ही क्यों? उन लोगों तो ऐसी किसी भी जगह पर किसी भी वक्त और किसी भी जगह होना ही नही नही चाहिये।
महिलाओं को सलाह देने से वो कमजोर ही होगीं और उन्हें प्रताडित करने वाले उत्साहित। समाज में इस तरह की घटनाओ से पीडित महिलाओं को आगे आने पर सम्मान देना चाहिये, न कि उनका मनोबल यह कहकर गिराया जाय कि जमाना खराब है तुम सम्हालकर रहो। उस रास्ते पर मत जाओ, ऐसे कपडे मत पहनो, रात को घर से मत निकलो या अकेले कहीं मत जाओ।
किसी महिला को कहाँ जाना? क्या करना है? और क्या पहनना है ये उसकी मर्जी से होना चाहिये। क्योंकि किसी महिला के कहीं जाने से, अपनी मर्जी के कपडे पहनने से किसी को ये हक नही मिल जाता कि वो उसके साथ मनमानी करने लगे।
अच्छा था कि वो घटना सीसीटीवी में कैद हो गयी नही तो कुछ लोग तो इस बात को सच ही नही मानते। ऐसी ही सोच के चलते महिलायें शिकायत के लिये आगे नही आतीं। हो सकता है कि वो लडकी भी उन हजारो लडकियों की तरह पुलिस में शिकायत करने की न सोच पाती, जो इस तरह की घटना के बाद अपनी बदनामी होने की वजह से चुप हो बैठ जातीं है।
एक तरफ महिलाओं को बराबरी का हक देने की बात कही जाती है वहीं ये बातें भी? कैसे मिलेगा महिलाओं को बराबरी का हक? जब महिला शाम ढलने के बाद सडकों पर सुरक्षित नही तो कैसे बराबरी का हक उसे मिल पायेगा? जैसे पुरुष किसी भी समय अकेले कहीं आ जा सकता है, तो महिला क्यों नही आ जा सकती? असली बराबरी तो महिला को तभी मिलेगी जब वो विना किसी डर के किसी भी समय कहीं आ जा सकेगी।
ऐसा नही कि ये एक अकेली घटना थी जहाँ इस तरह का वाकया हुआ। उसी समय दिल्ली में, जो हमारे देश की राजधानी है, वहाँ भी इस तरह की घटना हो चुकी थी। अगले दिन ही टीवी में वो घटना दिखायी जाने लगी। जब देश की राजधानी में रात के वक्त महिलाओं की ये स्थिति है तो अन्य जगहों की हालत का अन्दाजा अपने आप लगाया जा सकता है।
हम जितनी सलाह किसी घटना के बाद महिला को देने लगते हैं अगर इतनी सलाह इसके लिये जिम्मेदार लोगों को दे और और उस पीडित महिला का साहस इस तरह की घटना के खिलाफ खडे होने के लिये बढायें तो शायद हमें बेहतर परिणाम मिलें। क्योंकि सिर्फ बचने के तरीके से ही किसी से जंग नही जीती जा सकती, उससे लडना आना और लडना भी जरूरी होता है।





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