चाँद बोला चाँदनी

03 फरवरी 2017   |  गंगा धर शर्मा 'हिंदुस्तान '   (85 बार पढ़ा जा चुका है)

गज़ल

चाँद बोला चाँदनी, चौथा पहर होने को है.

चल समेटें बिस्तरे वक्ते सहर होने को है.


चल यहाँ से दूर चलते हैं सनम माहे-जबीं.

इस जमीं पर अब न अपना तो गुजर होने को है.


है रिजर्वेशन अजल, हर सम्त जिसकी चाह है.

ऐसा लगता है कि किस्सा मुख़्तसर होने को है.


गर सियासत ने न समझा दर्द जनता का तो फिर.

हाथ में हर एक के तेगो-तबर होने को है.


जो निहायत ही मलाहत से फ़साहत जानता.

ना सराहत की उसे कोई कसर होने को है.


है शिकायत , कीजिये लेकिन हिदायत है सुनो.

जो कबाहत की किसी ने तो खतर होने को है.


पा निजामत की नियामत जो सखावत छोड़ दे.

वो मलामत ओ बगावत की नजर होने को है.


शान 'हिन्दुस्तान' की कोई मिटा सकता नहीं.

सरफ़रोशों की न जब कोई कसर होने को है.

*गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान' (कवि एवं साहित्यकार)*

*अजमेर(राजस्थान)*



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