गरीबी

04 फरवरी 2017   |  सत्येन्द्र सिंह   (110 बार पढ़ा जा चुका है)

गरीबी इस कदर मेरे देश मे है यारों,

कि जिन्दगी मोहताज़ है दो वक्त की रोटी के लिए...

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तू
हाथ की लकीरों पर लिखे तेरे नाम को, कैसे दूँ मिटा, तू ही बताआँखो में बसी तेरी तस्वीर को, कैसे दूँ मिटा, तू ही बताहोंठों पे आए तेरे गीतों को, कैसे दूँ मिटा, तू ही बताजिस्म में बसी तेरी ख़ुशबू को, कैसे दूँ मिटा, तू ही बतामन में बसे तेरे ख़यालों को, कैसे दूँ मिटा, तू ही बतादिल में तेरे लिए उमड़ते जस्बाद
06 फरवरी 2017
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तुम मेरे साथ हो, यह कम है क्या चाहती हो मुझे, यह कम है क्या भर आती हैं आँखें, मेरे दर्द, मेरी ख़ुशी में, यह कम है क्या बाँट नहीं सकती मेरा समय किसी और के साथ, यह कम है क्याजान छिड़कती हो मुझ पर, यह कम है क्या कर देती हो हँस कर मेरी हर ख़ता को माफ़, यह कम है क्या स्वीकारा है मुझे सब कमज़ोरियों के साथ
18 फरवरी 2017
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