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तुम्हारी चाहत --- कविता

12 फरवरी 2017   |  रेणु
तुम्हारी चाहत  --- कविता

अनमोल है तुम्हारी चाहत -

जो नहीं चाहती मुझसे ,

कि मैं सजूँ सवरू और रिझाऊं तुम्हे ;

जो नहीं पछताती मेरे - विवादास्पद अतीत पर ,

और मिथ्या आशा नहीं रखती -

मेरे अनिश्चित भविष्य से ;

व्यर्थ के प्रणय निवेदन नहीं है -

और न ही मुझे बदलने का कुत्सित प्रयास !

मेरी सीमायें और असमर्थतायें सभी जानते हो तुम ,

सुख में भले विरक्त रहो -

पर दुःख में मुझे संभालते हो तुम ;

ये चाहत नहीं चाहती कि मैं बदलूं

और भुला दूं अपना अस्तित्व ;

सच तो ये है कि -------

अनंत है तुम्हारा आकाश ,

मेरी कल्पना से कहीं विस्तृत -----

जिस में उड़ रहे तुम और मैं भी स्वछंद हूँ -

सर्वत्र उड़ने के लिये ! !

अनमोल है तुम्हारी चाहत |

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