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तुम्हारी चाहत --- कविता

12 फरवरी 2017   |  रेणु

तुम्हारी चाहत  --- कविता

अनमोल है तुम्हारी चाहत -

जो नहीं चाहती मुझसे ,

कि मैं सजूँ सवरू और रिझाऊं तुम्हे ;

जो नहीं पछताती मेरे - विवादास्पद अतीत पर ,

और मिथ्या आशा नहीं रखती -

मेरे अनिश्चित भविष्य से ;

व्यर्थ के प्रणय निवेदन नहीं है -

और न ही मुझे बदलने का कुत्सित प्रयास !

मेरी सीमायें और असमर्थतायें सभी जानते हो तुम ,

सुख में भले विरक्त रहो -

पर दुःख में मुझे संभालते हो तुम ;

ये चाहत नहीं चाहती कि मैं बदलूं

और भुला दूं अपना अस्तित्व ;

सच तो ये है कि -------

अनंत है तुम्हारा आकाश ,

मेरी कल्पना से कहीं विस्तृत -----

जिस में उड़ रहे तुम और मैं भी स्वछंद हूँ -

सर्वत्र उड़ने के लिये ! !

अनमोल है तुम्हारी चाहत |


काश वो भी जान जाते हदे हमारी
तो क्या होता
हम भी जान जाते ये दुनिया सारी

रेणु
11 जून 2017

गौतम जी हार्दिक आभार --------

मन के भावों की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है।
लेकिन यहाँ किसी को प्रेम नहीं केवल लोलुप आसक्ति है।

रेणु
18 मई 2017

नृपेंद्र जी -- कविता को पढ़ने के आपका हार्दिक धन्यवाद

चाहत भी एक मंजिल ही होती है
रास्ते भटक जाओगे तो उम्र भर ना पहुँचोगे सागर

रेणु
25 अप्रैल 2017

अपना अपना ख्याल है -- सागर जी -- प्रकट करने के लिए आपका हार्दिक आभार --

विश्वमोहन
02 अप्रैल 2017

तुम वाणी की वीणा के स्वर रेणु हो/
या, फिर मोहन के अधरों के वेणु हो/

पंख है ,आसामां है
प्रेम का संसार है
उड़े तो अंक
गिरे तो रंक
बस ,एक विश्वास है,
समर्पण है,चाहत है
देने को बहुत कुछ
पाने को जहां है।

रेणु
26 मार्च 2017

हार्दिक धन्यवाद मेरे बंधु !

आपकी रचनाधर्मिता को नमन

अप्रितम रचनात्मकता ........

क्या बात है आदरणीया एक पढता हूँ तो दूसरे को पढने की ललक बढ़ जाती है, निशब्द हूँ, अनुपम अतु सशक्त कलम, नमन

रेणु
27 फरवरी 2017

आपने मुझे अभिभूत कर दिया मिश्रा जी -- सादर व विनम्र आभार -

बहुत खूबसूरत रचनात्मकता

रेणु
25 फरवरी 2017

धन्यवाद धर्मेन्द्र जी

कृष्ण राघव
15 फरवरी 2017

प्रिय रेणु , तुम्हारी योग्यता पर मुझे कभी संदेह नहीं रहा किन्तु इस बार तो तुमने कमाल ही कर दिया. बिना लाग- लपेट के कहूँ तो ये बड़ी ही उत्कृष्ट और उच्चकोटि की कविता है. बधाई और आशीष!

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