फागुन में उस साल

13 फरवरी 2017   |  रेणु   (352 बार पढ़ा जा चुका है)

फागुन    में  उस  साल

फागुन मास में उस साल -

मेरे आँगन की क्यारी में ,

हरे - भरे चमेली के पौधे पर -

जब नज़र आई थी शंकुनुमा कलियाँ

पहली बार !

तो मैंने कहा था कलियों से चुपके से -

"कि चटकना उसी दिन

और खोल देना गंध के द्वार ,

जब तुम आओ "

आकाश में भटकते

आवारा काले बादलों से गुहार

लगाई थी मैंने -

''कि हलके से बरस जाना -

जब तुम आओगे

और शीतलता में बदल देना

आँगन की उष्मता की हर दिशा को .''

अचानक एक दिन खिलखिलाकर -

हँस पड़ी थीं चमेली की कलियाँ ,

और आवारा काले बादल --

झूम - झूम कर बरसने लग गए थे -----

देखा तो द्वार पर तुम खड़े थे -

मुस्कुराते हुए ;

जिसके आने की आहट मुझसे पहले -

जान गए थे ,

अधखिली कलियाँ और आवारा बादल,

जैसे चिड़ियाँ जान जाती हैं -

धूप में भी आने वाली -

बारिश का पता

और नहाने लग जाती हैं

सूखी रेत में------------ ! ! !

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विश्वमोहन
02 अप्रैल 2017

तो मैंने कहा था कलियों से चुपके से -
"कि चटकना उसी दिन
और खोल देना गंध के द्वार ,
जब तुम आओ ".........
मानवीकरण अलंकार की चमत्कृत शैली!!! बधाई , रेणुजी!

शानदार ... प्रकृति की रचना तब होती है जब भीतर की प्रकृति हरियाली हो - बधाई

रेणु
04 मार्च 2017

बहुत आभार - पंकज जी

शंकुनुमा कलियाँ, वाह आदरणीया प्रकृति और प्रतीकों का अनुपम संगम, नमन करता हूँ कलम को और गहनतम दृष्टिमय विचार को, हार्दिक बधाई

रेणु
27 फरवरी 2017

आपका बार - बार धन्यवाद मिश्रा जी

सुन्दर रचना

रेणु
21 फरवरी 2017

धन्यवाद सतपाल जी

khubsrat रचनात्मकता

रेणु
21 फरवरी 2017

आभार

ह्रदय के भावो ko शब्द माला में गूथन

ह्रदय के भावो ko शब्द माला में गूथन

कृष्ण राघव
15 फरवरी 2017

अपनी कविताओं को संजोवो रेणु , इन्हें छापना चाहिए. इतना उत्कृष्ट लिखती हो तुम. मर्मस्पर्शी कविता है यह. अनुराग से लबालब भरी हुई. वाह.

देखा तो द्वार पर तुम खड़े थे -
मुस्कुराते हुए ;
जिसके आने की आहट मुझसे पहले -
जान गए थे ,
इतनी सुन्दर कविता की किसी का भी मन मोह ले

रेणु
14 फरवरी 2017

रियंका जी, मेरा उत्साह बढ़ने के लिया बहुत आभार -

प्रकृति के अनुपम सौंदर्य की छटा बिखेरती मन को तरोताज़ा करती हृदयस्पर्शी रचना. बधाई!

रेणु
14 फरवरी 2017

बहुत आभार रविंदर जी

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