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फागुन में उस साल

13 फरवरी 2017   |  रेणु

फागुन    में  उस  साल

फागुन मास में उस साल -

मेरे आँगन की क्यारी में ,

हरे - भरे चमेली के पौधे पर -

जब नज़र आई थी शंकुनुमा कलियाँ

पहली बार !

तो मैंने कहा था कलियों से चुपके से -

"कि चटकना उसी दिन

और खोल देना गंध के द्वार ,

जब तुम आओ "

आकाश में भटकते

आवारा काले बादलों से गुहार

लगाई थी मैंने -

''कि हलके से बरस जाना -

जब तुम आओगे

और शीतलता में बदल देना

आँगन की उष्मता की हर दिशा को .''

अचानक एक दिन खिलखिलाकर -

हँस पड़ी थीं चमेली की कलियाँ ,

और आवारा काले बादल --

झूम - झूम कर बरसने लग गए थे -----

देखा तो द्वार पर तुम खड़े थे -

मुस्कुराते हुए ;

जिसके आने की आहट मुझसे पहले -

जान गए थे ,

अधखिली कलियाँ और आवारा बादल,

जैसे चिड़ियाँ जान जाती हैं -

धूप में भी आने वाली -

बारिश का पता

और नहाने लग जाती हैं

सूखी रेत में------------ ! ! !


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