अलमस्त बचपन -- कविता

25 फरवरी 2017   |  रेणु   (519 बार पढ़ा जा चुका है)

अलमस्त   बचपन  -- कविता

भरपूर हरियाली खेतों की ---

और बचपन की ये मस्त अदा !

तन धरा पे मन अम्बर में -

हटी है जग की हर बाधा !!

खुशियों का जब चला काफिला -

झुक - सा गया गगन नीला .

धरती की गोद में अनायास -

कोई फूल सा आन खिला ;

फैंक दिया किताबों का झोला--

ना कांधे कोई बोझ लदा !!

बेफिक्री के इस आलम पे

अपनी सौ - सौ जान फ़िदा !!!!!!!!!!!!!


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sanjay nirala
27 अगस्त 2018

बहुत ही सुन्दर रचना 👌
धन्यवाद 🙏

रेणु
30 अगस्त 2018

सस्नेह आभार संजय जी

babli
27 अगस्त 2018

very nice

babli
27 अगस्त 2018

very nice

रेणु
30 अगस्त 2018

सस्नेह आभार बबली जी

babli
27 अगस्त 2018

hi

babli
27 अगस्त 2018

hiii massi g

babli
27 अगस्त 2018

hiii massi g

वाह आपकी बाल कविता को सुनकर एक बार फिर बालपन मे मन चला गया.

रेणु
30 अगस्त 2018

सादर आभार आदरणीय कैलाश जी

सुन्दर रचना।

रेणु
29 जून 2017

सादर आभार आदरणीय जोशी जी

Sudha Devrani
29 जून 2017

वाह!!!
बहुत

रेणु
29 जून 2017

सुधा जी सस्नेह आभार -------

बहुत उम्दा ! रचना रेणु जी आभार ,"एकलव्य"

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