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तुम्हारी आँखों से --

26 फरवरी 2017   |  रेणु

तुम्हारी  आँखों से  --

तुम्हारी आँखों से छलक रही है

किसी की चाहत अनायास --

जो भरी हैं पूनम जैसे उजास से

और हर पल चमकती हैं ---

अँधेरे में जलते दो दीपों की मानिंद ;

जो बह रही है ----

तुम्हारी बेलौस हंसी के जरिये

किसी निर्मल और निर्बाध निर्झर सी ! !

किसी के सर्वस्व समर्पण ने -

महका दिया है ---

तुम्हारे अंग - प्रत्यंग को ,

तभी तो तुम्हारी देह ----

नज़र आती है हरदम --

किसी खिले फूल सी ---- ! !

ये चाहत सम्भाल रही है तुम्हे --

जीवन के हर मोड़ पर -- ;

अपनी सीमाओं में बंधी तुम ,

भटकने -बहकने से दूर

बही जा रही हो --- ---

सदानीरा नदिया सी मचलती और हुलसती--

गंतव्य की और ----- ! !

ये चाहत फ़ैल रही है -

यत्र - तत्र - सर्वत्र ---

सुवासित चंचल पवन की तरह ----

बन्धनों से मुक्त हो ----- ;

सच तो ये है --

कि तुम्हारे भीतर समां चुका है

किसी और का अस्तित्व -- ;

और दो आत्माएं --

ले चुकी हैं एकाकार ----------! ! !


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