तुम्हारी आँखों से --

26 फरवरी 2017   |  रेणु   (221 बार पढ़ा जा चुका है)

तुम्हारी  आँखों से  --

तुम्हारी आँखों से छलक रही है

किसी की चाहत अनायास --

जो भरी हैं पूनम जैसे उजास से

और हर पल चमकती हैं ---

अँधेरे में जलते दो दीपों की मानिंद ;

जो बह रही है ----

तुम्हारी बेलौस हंसी के जरिये

किसी निर्मल और निर्बाध निर्झर सी ! !

किसी के सर्वस्व समर्पण ने -

महका दिया है ---

तुम्हारे अंग - प्रत्यंग को ,

तभी तो तुम्हारी देह ----

नज़र आती है हरदम --

किसी खिले फूल सी ---- ! !

ये चाहत सम्भाल रही है तुम्हे --

जीवन के हर मोड़ पर -- ;

अपनी सीमाओं में बंधी तुम ,

भटकने -बहकने से दूर

बही जा रही हो --- ---

सदानीरा नदिया सी मचलती और हुलसती--

गंतव्य की और ----- ! !

ये चाहत फ़ैल रही है -

यत्र - तत्र - सर्वत्र ---

सुवासित चंचल पवन की तरह ----

बन्धनों से मुक्त हो ----- ;

सच तो ये है --

कि तुम्हारे भीतर समां चुका है

किसी और का अस्तित्व -- ;

और दो आत्माएं --

ले चुकी हैं एकाकार ----------! ! !

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समर्पण के आयाम प्रस्तुत करती भावप्रवण मार्मिक प्रस्तुति. बधाई .

रेणु
13 मार्च 2017

धन्यवाद रविद्र जी --

अलोक सिन्हा
06 मार्च 2017

बहुत ही सराहनीय एवं सशक्त रचना है ये आपकी | बहुत बहुत बधाई |

रेणु
06 मार्च 2017

आलोक जी --आपने मुझे उत्साह से भर दिया -- आपका हार्दिक आभार --

विश्वमोहन
03 मार्च 2017

सुन्दर

रेणु
07 मार्च 2017

विष्वमोहन जी , रचना पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार

विश्वमोहन
03 मार्च 2017

सच तो ये है -- कि तुम्हारे भीतर समां चुका है किसी और का अस्तित्व -- ; और दो आत्माएं -- ले चुकी हैं एकाकार ----------! ! !

बहुत उम्दा रेणु जी

रेणु
02 मार्च 2017

रश्मि जी - धर्मेद्र जी हार्दिक आभार रचना को अपना समय देने के लिए

रश्मि प्रभा
02 मार्च 2017

प्यार भरे एहसास

रवि कुमार
28 फरवरी 2017

सुंदर शब्दों की माला पिरोई है जैसे

रेणु
28 फरवरी 2017

हार्दिक आभार रवि भाई

ह्रदय से स्वागत है आदरणीया

कल्पना का सागर लहरा दिया आप ने आदरणीया, बहुत सुंदर वाह वाह

रेणु
27 फरवरी 2017

ये मेरा सौभाग्य है-- मिश्रा जी - कि आपने अपना कीमती समय इव शब्दों के लिए दिया आपका - हार्दिक धन्यवाद

बहुत ही सुन्दर कल्पना

रेणु
27 फरवरी 2017

पूर्णिमा जी आपका बहुत धन्यवाद

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