मशाल बुझी हुई है ....

01 मार्च 2017   |  डॉ हरेश परमार   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

मशाल बुझी हुई है ....

मशाल बुझी हुई है ....

कोई फूल मुरझाये

आपको क्या ?

कोई पत्थर पर चढ़ जाए

आपको क्या ?

क्या कोई इंसान भी जिन्दा है यहाँ

चाँद पर जाने से जैसे

चाँद भी पत्थर हो गया ...

चांदनी हो गई उजाला ...

माफ़ करना मेरे दोस्त !

यहाँ पर कोई तुम्हारी उम्मीद सुनने नहीं आये है

सपने तो ‘पाश’ के समय में भी मरते थे

आज सपनों के साथ इन्सान भी मरता है

पर मशाल मेरी बुझी हुई है ....

-

हरेश परमार

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सपने तो ‘पाश’ के समय में भी मरते थे. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

धन्यवाद

रेणु
15 अप्रैल 2017

अंतर्मन की आकुलता भरी सुंदर रचना --

डॉ हरेश परमार
18 अप्रैल 2017

आपके विचारों को यह रचना अच्छी लगी, मैं अपने प्रयास को सार्थक समझता हूँ, धन्यवाद

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