कल सपने में ---- नव गीत

04 मार्च 2017   |  रेणु   (220 बार पढ़ा जा चुका है)

कल  सपने  में ---- नव  गीत

कल सपने में हम जैसे -

इक सागर तट पर निकल पड़े!

लेकर हाथ में हाथ चले

और निर्जन पथ पर निकल पड़े

जहाँ फैली थी मधुर चांदनी -

शीतल जल के धारों पे ,

कुंदन जैसी रात थमी थी --

मौन स्तब्ध आधारों पे

फेर आँखे जग - भर से वहां-

दो प्रेमी नटखट निकल पड़े

फिर से हमने चुनी सीपियाँ--

और नाव डुबोई कागज की ,

वहीँ रेत के महल बना बैठे -

भूली थी सब पीड़ा जग की ;

हम मुस्काये तो मुस्काते -

तारों के झुरमुट निकल पड़े !

ठहर गई थी वहां हवाएं --

बाते सुनने कुछ छुटपन की ,

दो मन थे अभिभूत प्यार से --

ना बात थी कोई अनबन की ;

कोई भूली कहानी याद आई -

कई बिसरे किस्से निकल पड़े- !

कभी राधा थे - कभी कान्हा थे -

मिट हम तुम के सब भेद गए ;

कुछ लगन मनों में थी ऐसी -

हर चिंता , कुंठा छेद गए ,

मन के रिश्ते सफल हुए -

और तन के रिश्ते शिथिल पड़े !

कल सपने में हम जैसे -

इक सागर तट पर निकल पड़े ------ !

लेकर हाथ में हाथ चले - -

और निर्जन पथ पर निकल पड़े--- 1 !

अगला लेख: तुम्हारी आँखों से --



अतीत को खंगालती अनुपम प्यार की गरिमा लिए यह रचना बेहद आकर्षक बन पडी है - बधाई

रेणु
29 मार्च 2017

धन्यवाद पंकज जी !

बहुत ही सुन्दर पंक्तियो का प्रयोग किया , पढ कर मन प्रफुल्लित हो गया,

रेणु
27 मार्च 2017

धन्यवाद हेम जी --

शानदार

रेणु
21 मार्च 2017

धन्यवाद गोविन्द भाई --

कल सपने में हम जैसे - इक सागर तट पर निकल पड़े ------ ! लेकर हाथ में हाथ चले - -और निर्जन पथ पर निकल पड़े.......वाह वाह और वाह, अतीव सुंदर सृजन आदरणीया

रेणु
20 मार्च 2017

धन्यवाद मिश्रा जी --

विश्वमोहन
09 मार्च 2017

पथ की निर्जनता भंग हुई
राधा कान्हा के संग हुई।
सृष्टि का कण कण चेतन
प्रकृति पुरुष में रंग गयी।।

रेणु
18 मार्च 2017

विश्वमोहन जी -- आपकी इस टिप्पणी ने मेरी साधारण सी रचना में चार चाँद लगा दिए -- ! 1 आपका हार्दिक आभार --

bhaw se bhari hui

आलोक सिन्हा
06 मार्च 2017

अच्छी रचना है - मन को सुरभि से भर देने वाली |

रेणु
06 मार्च 2017

आभार आलोक जी --

नई सुबह जैसी खूबसूरत रचना

रेणु
06 मार्च 2017

आभार - प्रियंका जी !

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