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कल सपने में ---- नव गीत

04 मार्च 2017   |  रेणु

कल  सपने  में ---- नव  गीत

कल सपने में हम जैसे -

इक सागर तट पर निकल पड़े!

लेकर हाथ में हाथ चले

और निर्जन पथ पर निकल पड़े

जहाँ फैली थी मधुर चांदनी -

शीतल जल के धारों पे ,

कुंदन जैसी रात थमी थी --

मौन स्तब्ध आधारों पे

फेर आँखे जग - भर से वहां-

दो प्रेमी नटखट निकल पड़े

फिर से हमने चुनी सीपियाँ--

और नाव डुबोई कागज की ,

वहीँ रेत के महल बना बैठे -

भूली थी सब पीड़ा जग की ;

हम मुस्काये तो मुस्काते -

तारों के झुरमुट निकल पड़े !

ठहर गई थी वहां हवाएं --

बाते सुनने कुछ छुटपन की ,

दो मन थे अभिभूत प्यार से --

ना बात थी कोई अनबन की ;

कोई भूली कहानी याद आई -

कई बिसरे किस्से निकल पड़े- !

कभी राधा थे - कभी कान्हा थे -

मिट हम तुम के सब भेद गए ;

कुछ लगन मनों में थी ऐसी -

हर चिंता , कुंठा छेद गए ,

मन के रिश्ते सफल हुए -

और तन के रिश्ते शिथिल पड़े !

कल सपने में हम जैसे -

इक सागर तट पर निकल पड़े ------ !

लेकर हाथ में हाथ चले - -

और निर्जन पथ पर निकल पड़े--- 1 !


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