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सिर्फ़ एक दिन नारी का सम्मान, शेष दिन ........ ?

08 मार्च 2017   |  रवीन्द्र सिंह यादव
सिर्फ़ एक दिन नारी का सम्मान, शेष दिन ........ ?


मही अर्थात धरती , जिसे हिला कर रख दे वह है महिला। 8 मार्च संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा महिलाओं के सम्मान को समर्पित दिन है जिसके आसपास के दिन भी नारी - अस्मिता के उल्लेखों से सराबोर रहते हैं. विश्व पटल पर नारी की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दशा और उपलब्धियों के बख़ान का यह दिन गुज़र जाता है कुछ विचारोत्तेजक ,सारगर्भित चर्चाओं और प्रकाशनों के साथ।


' 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस '


वर्ष के शेष दिन.....?


संघर्ष के दिन ,


अपमान के दिन ,


उत्पीडन के दिन ,


अंतहीन पीड़ा के दिन ,


ख़ुशी और ग़म के दिन ,


सजाकर पेश करने के दिन ,


प्रताड़ना और तानों के दिन,


गौरव / अभिमान के दिन ,


त्याग और समर्पण के दिन ,


प्रतिबन्ध और वर्जनाओं के दिन ,


मन मारकर रह जाने के दिन ,


पुरुष-सत्ता के क्षोभ सह लेने के दिन ,


समाज की दोगली सोच के दिन ,


कामुकता से उफनते पुरुष की कुदृष्टि के दिन,


भोग्या की नियति होकर मर-मर कर जीने के दिन,


माँ, बहन , भार्या , बेटी होने के दिन ,


समाज के क़ानून को ढोने के दिन,


दिन पर दिन ......364 दिन ,


नारी -सम्मान का स्मरण ,


फिर 8 मार्च के दिन,


सिर्फ़ एक दिन... ?



नारी के सम्मान में स्थापित विचार -


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवतः,


”जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”,


‘मातृदेवो भवः’ ,


पुरातन काल से अब तक नारी-संघर्ष की गाथा अनेक आयामों से भरी हुई है। हिंसा और लूटपाट का दौर थमा तो समाज ने व्यवस्थित जीवन के लिए नियमावली तैयार की और दुनिया में महिला अधिकारों के साथ क़ानून अस्तित्व में आये फिर भी दुनिया में स्त्रियों के लिए सभी देशों में समान अधिकार नहीं हैं। कहीं नारी स्वतंत्रता का ऐसा बोलबाला है कि स्त्रियां पुरुषों के उत्पीड़न का कारण तक बन गयीं हैं तो कहीं ऐसी स्थिति भी सामने आयी कि महिलाओं को मतदान तक का अधिकार नहीं दिया गया। महिला-पुरुष मज़दूरी तक में भेदभाव रखा गया।


स्त्रियों पर जबरन अपनी सोच थोपता रहा समाज आज उनके जाग्रत होते जाने से उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है। कोई स्त्री के वस्त्र धारण करने के तौर - तरीकों पर अपनी कुंठा बघार रहा है तो कोई स्त्री को रात में घर से बाहर न निकलने की सलाह दे रहा है लेकिन उन वहशी दरिंदों को कोई कुछ नहीं कहता जो किसी न किसी घर के बेटे हैं जो स्त्री की गरिमा को धूल में मिलाने में ज़रा भी शर्म नहीं करते।


कोई धार्मिक -ग्रंथों की व्याख्या को अपनी संकुचित सोच का जामा पहनाकर पेश कर रहा है तो कोई नारी-स्वतंत्रता एवं बराबरी के हक़ के लिए आनदोलनरत है। महिला -उत्पीड़न के समाचारों का ग्राफ़ नई ऊँचाइयाँ छू रहा है क्योंकि उद्दंड युवा पीढ़ी स्त्रियों के प्रति नफ़रत और कलुषित भाव से भर गयी है। परिवारों के बिखरने का सिलसिला रफ़्तार पकड़ रहा है।


ग़रीब स्त्री आज भी समाज के अनेक प्रकार के शोषण और अत्याचार का शिकार बनी हुई है। समाज का चतुर-चालाक तबका अंधविश्वास और अशिक्षा का भरपूर लाभ उठा रहा है। केरल के एक पादरी का बयान कि जीन्स पहनने वाली महिलाओं को समुद्र में फिकवा देना चाहिए , नगालैंड में महिला आरक्षण का पुरुषों द्वारा तीव्र विरोध , 3 तलाक़ पर भारत में छिड़ी बहस , सिनेमा में स्त्री को किस रूप में पेश किया जाय इस मुद्दे पर बहस ज़ारी है।


भारत में महिला उत्पीड़न को रोकने के लिए 16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली में घटित निर्भया - काण्ड के बाद हुए आंदोलन के उपरान्त सर्वोच्च न्यायलय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस जे. एस. वर्मा ( अब स्वर्गीय) की अध्यक्षता में बने तीन सदस्यीय आयोग ने बेहद सख़्त क़ानून का ख़ाका पेश किया जिसे भारत सरकार ने 3 अप्रैल 2013 से लागू कर दिया फिर भी सरकारी मशीनरी उस क़ानून को लागू कर पाने में भ्रष्टाचार और राजनैतिक दखल के चलते असफल होती चली आ रही है जिसमें महिलाओं को घूरने, पीछा करने , बिना सहमति के शरीर को हाथ लगाने ,इंटरनेट पर महिलाओं की जासूसी करने आदि तक को ( तब तक उपेक्षित मांगों ) भी शामिल किया गया है।


नारी को समाज में प्रतिष्ठा और अधिकारों के लिए अभी लंबा संघर्ष करना है। शिक्षा एक ऐसा हथियार है जो स्त्री को उसके वांछनीय गौरव को हासिल होने में सहायक सिद्ध हुआ है। आज हम देखते हैं कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों को बढ़ावा दिया जा रहा है उसके पीछे भी समाज की उदारता नहीं बल्कि कायरता छुपी है क्योंकि वह जानता है कि स्त्री कानूनों के चलते उनके कार्यस्थल सुरक्षित रहेंगे और स्त्रियों के प्रति दया भाव और उनका आकर्षण उनकी व्यावसायिक सफलता का हेतु बनता है।


स्त्रियों से आह्वान किया जाता है कि अब जागो , ख़ुद को बुलंद करो ,अपना मार्ग प्रशस्त करो जिससे फिर कोई महाकवियत्री महादेवी बनकर न लिख दे " मैं नीर भरी दुःख की बदली "।


आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को मेरा नमन।


भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति का एक एक उदाहरण मैं अपनी यू ट्यूब पर प्रस्तुति " ज़िन्दगी का सफ़र पगडंडियों पर " के मार्फ़त प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें एक विधवा पिछले 22 वर्षों से विधवा -पेंशन के लिए संघर्षरत है .


14 मिनट 8 सेकण्ड का समय देना ज़रूरी है यह जानने के लिए कि जिनके पास शब्द और साधन नहीं हैं उन महिलाओं पर क्या बीतती है जीवनभर......


जिसका लिंक है - https://youtu.be/Nbxufhttps:/hMHgDQ

- रवीन्द्र सिंह यादव

रवीन्द्र सिंह यादव

कविता,कहानी और लेख लिखते -लिखते समझ विकसित हुई तो पाया 'जीवनचर्या के लिए केवल लेखन कार्य पर निर्भर रहना नादानी है '. वर्तमान में मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट के तौर पर नई  दिल्ली में निजी संस्थान में कार्यरत . इटावा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल (महाराजपुरा , तहसील चकरनगर )  में जन्म , म. प्र. के कई ज़िलों में रहकर शिक्षा प्राप्ति.आकाशवाणी  ग्वालियर  म. प्र.   से  1992   - 2003    के बीच  कविता, कहानी, विशेष कार्यक्रम  आदि  का नियमित प्रसारण. ग्वालियर  से प्रकाशित    विभिन्न  दैनिक  समाचार-पत्रों   में  लेख व  कविताओं का प्रकाशन .ब्लॉग- हिन्दी-आभा*भारत (https://hindilekhanmeridrishti.blogspot.com), हमारा आकाश(https://hamaraakash.blogspot.com)पर  सक्रिय.

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