होली गीतों की भूली बिसरी परम्परा

09 मार्च 2017   |  रेणु   (301 बार पढ़ा जा चुका है)

होली गीतों की  भूली  बिसरी परम्परा

होली का पर्व अपने साथ ऐसा उल्लास और उमंग ले कर आता है जिसमे हर इन्सान आकंठ डूब जाता है | ये फाल्गुन मास में आता है | फाल्गुन मास में बसंत ऋतुअपने चरम पर होतीहै | कहना अतिशयोक्ति ना होगा कि फागुन मास में प्रकृति का उत्सव मनता है | धरती सरसों के पीले फूलों और गेहूं की धूसर बालियों से सजी होती है | पतझड़ में वृक्षों से पुराने पत्ते झड जाते हैं - और वे नए चिकने पत्तों से सजे होते हैं -- आम बौराने लगते है -- हर रंग के फूल इस मौसम में खिलकर प्रकृति की शोभा में चार चाँद लगते हैं | ये प्रकृति के महारास की बेला है-- जहाँ संगीत है -- तो गीत और नृत्य भी है | लोक जीवन में इस त्यौहार के आसपास गीत - संगीत की सुदीर्घ परम्परा रही है | लगभग दो दशक पूर्व तक उत्तर भारत के लगभग हर गाँव में- होली से कई दिन पहले से ही रातों में होली के गीत- संगीत की शुरुआत हो जाती थी | महिलाएं रात में इकठ्ठी हो कर करतल ध्वनि के साथ गोल दायरे में घूम कर होली के गीत गाती | जब महिलाएं होली के गीतों का गायन कर रही होती तो कच्चे लिपे पुते आँगन में धूल उठ जाती , जो उड़कर आसमान छूती प्रतीत होती| मस्ती और उमंग से भरी इन रातों में - पायल की झंकार और ढोलकी की थाप पर गीतों की होली का सिलसिला देर रात तक चलता | प्राय ये गीत - संगीत फाल्गुन मास के प्रारम्भ से ही शुरू हो जाता , पर इसमें तेजी अमावस के बाद आती , जब ठण्ड नाममात्र की रह जाती और चन्द्रमा अपने यौवन की तरफ बढ़ने लगता | फाल्गुन मास की उन दूधिया चांदनी से भरी रातों में होली के गीतों की सुरीली ताने अद्भुत होती |समाज में व्याप्त कई वर्जनाये , पीड़ा प्रेम , विरह आदि इन लोक गीतों विषय होते | इन गीतों के बाद लोकनृत्य और चुहलबाजी का दौर शुरू हो जाता | वैसे पुरुषवर्ग को इन आयोजनों में आने की सख्त मनाही थी , फिर भी अक्सर वे लुकछिप कर इन गीतों भरी रातों का दीदार करते देखे जाते !

समय बदल गया और भौतिक प्रगति के फलस्वरूप टीवी संस्कृति का आगमन हुआ और होली के मधुर लोकगीतों का ये सुनहरी दौर अतीत बनकर रह गया | पर जिन लोगों ने भी उन जादुई लम्हों को जिया है -- कच्चे आँगन से आसमान तक जाती धूल की सौधी खुशबू में लिपटे वे गीत उनकी यादों में हमेशा गूंजते रंहेगे| आज गाँव के बड़े - बड़े आँगन भी सिमटकर छोटे - छोटे रह गए हैं -- वो भी कंक्रीट के बने ! उनमे उस नैसर्गिक संगीत की कल्पना करना भी दुष्कर है | गीतों की विलुप्त होती परम्पराओं में रातों की संगीतमयी होली भी शामिल हो गई है | हो सकता है अब भी कोई ऐसा गाँव बचा हो जहाँ आज भी होली की ये अद्भुत परम्परा निभाई जाती हो |

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बहुत सुंदर सखी ,हमने गांव का आनंद बस होली के दिनों में उठा पाते थे जब ननिहाल जाते थे ,सही कहा तुमने अब वोमधुर दिन शायद कभी नहीं लौटेगे

रेणु
18 मार्च 2019

प्रिय कामिनी किसी और ने तो नहीं पढ़ा पर सखी तुम्हारे पढने से ये लेख सार्थक होगया | सस्नेह आभार सखी

अति सुंदर वर्णन मधुमास पर हुआ है आदरनिया, बिलकुल सही कहा आप ने अब परम्पराओं में देशज गीतों का अभाव और उल्लास दोनों विलुप्तिकरण के कगार पर हैं, हार्दिक बधाई आप को एवं पूरे परिवार को

रेणु
20 मार्च 2017

मिश्रा जी आपको भी हार्दिक बधाई --

रेणु जी,
नमस्कार
आपने लोक संस्कृति की परंपरा के भूले बिसरे गीतों पर अदभुत आलेख लिखा है..बधाई

आप मुझे अपना कोई नया आलेख, कहानी या अन्य रचना विश्वगाथा'' के लिए भेज सकती हैं
आलेख इस ईमेल पर ही भेजिए

vishwagatha@gmail.com

रेणु
11 मार्च 2017

हार्दिक आभार पंकज जी - !

क्या बात है रेणु जी , आपको तो बहुत ही गहरी पहचान है इन छोटी छोटी परम्पराओं की . अब न किसी के पास इतना समय है न ये समय बचा है . बहुत खूब

रेणु
11 मार्च 2017

जी बिलकुल सही कहा आपने - प्रियंका जी !

विश्वमोहन
10 मार्च 2017

आपके मीठे आलेख ने मेरी ग्रामीण पृष्ठभूमि को फिर से जगा दिया और मेरी यादों के झरोखों में गाँव की होली रंगीन हो उठी . मन प्रांतर होली की चुलबुली ठिठोली और मुंहजोर किन्तु रसदार गीतों के रस से सराबोर हो गया....... नथुनिया कागा ले भागा , सैंया अभागा ना जागा.....
बहुत सुन्दर लेख. बधाई!

रेणु
11 मार्च 2017

आप के भावभीने उत्साहवर्धन से अभिभूत हूँ विश्वमोहन जी --

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