तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

16 मार्च 2017   |  विश्वमोहन   (134 बार पढ़ा जा चुका है)

मीत मिले न मन के मानिक

सपने आंसू में बह जाते हैं।

जीवन के विरानेपन में,

महल ख्वाब के ढह जाते हैं।

टीस टीस कर दिल तपता है

भाव बने घाव ,मन में गहरे।


तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!


अंतरिक्ष के सूनेपन में

चाँद अकेले सो जाता है।

विरल वेदना की बदरी में

लुक लुक छिप छिप खो जाता है।

अकुलाता पूनम का सागर

उठती गिरती व्याकुल लहरें।


तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!


प्राची से पश्चिम तक दिन भर

खड़ी खेत में घड़ियाँ गिनकर।

नयन मीत में टाँके रहती,

तपन प्यार का दिनभर सहती।

क्या गुजरी उस सूरजमुखी पर,

अंधियारे जब डालें पहरे।


तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!


वसुधा के आँगन में बिखरी,

मैं रेणु अति सूक्ष्म सरल हूँ।

जीव जगत के अमृत घट में,

श्रद्धा पय मैं भाव तरल हूँ।

बहूँ, तो बरबस विश्व ये बिहँसे

लूँ विराम,फिर सृष्टि ठहरे।


तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!


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रेणु
17 मार्च 2017

विश्वमोहन जी -- बहुत खूब लिखा आपने -- तुम क्या जानो पुरुष जो ठहरे ! नारी मन खूब थाह पाई आपने -- बहुत सुंदर और हृदयस्पर्शी रचना है -- मन को अनायास करुणा से भर जाने वाली -- आप को हार्दिक बधाई --

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