क्या नारीशक्ति यथार्थ है

19 मार्च 2017   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (97 बार पढ़ा जा चुका है)

क्या नारीशक्ति यथार्थ है

नारी सशक्त हो रही है .इंटर में लड़कियां आगे ,हाईस्कूल में लड़कियों ने लड़कों को पछाड़ा ,आसमान छूती लड़कियां ,झंडे गाडती लड़कियां जैसी अनेक युक्तियाँ ,उपाधियाँ रोज़ हमें सुनने को मिलती हैं .किन्तु क्या इन पर वास्तव में खुश हुआ जा सकता है ?क्या इसे सशक्तिकरण कहा जा सकता है ? नहीं .................................कभी नहीं क्योंकि साथ में ये भी देखने व् सुनने को मिलता है . *आपति जनक स्थिति में पकडे गए तीरंदाज, *बेवफाई से निराश होकर जिया ने की आत्महत्या , *गीतिका ने , *फिजा ने और न जाने किस किस ने ऐसे कदम उठाये जो हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है . गोपाल कांडा के कारण गीतिका ,चाँद के कारण फिजा के मामले सभी जानते हैं और ये वे मामले हैं जहाँ नारी किसी और के शोषण का शिकार नहीं हुई अपितु अपनी ही महत्वकांक्षाओं का शिकार हुई .अपनी समर्पण की भावना के कारण ढेर हुई ये नारियां नारी के सशक्तिकरण की ध्वज की वाहक बनने जा रही थी किन्तु जिस भावना के वशीभूत हो ये इस मुकाम पर पहुंचना चाहती थी वही इनके पतन का या यूँ कहूं कि आत्महत्या का कारण बन गया ..ये समर्पण नारी को सशक्त नहीं होने देगा क्योंकि ये समर्पण जो सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ आधुनिक बनने की गरज में नारी करती है इसका खामियाजा भी वही भुगतती है क्योंकि प्रकृति ने उसे जो माँ बनने का वरदान दिया है वह उसके लिए इस स्थिति में अभिशाप बन जाता है और ऐसे में उसे मुहं छुपाने को या फिर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है .पुरुष के प्रतिष्ठा या चरित्र पर इसका लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता .नारायणदत्त तिवारी जी को लीजिये ,पता चल चुका है ,साबित हो चुका है कि वे एक नाजायज़ संतान के पिता हैं किन्तु तब भी न तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई अंतर आया और न ही उन्हें कहीं बहिष्कृत किया गया जबकि यदि उनकी जगह कोई नारी होती तो उसे कुलटा, कुलच्छनी जैसी संज्ञाओं से विभूषित करने से कोई बाज़ नहीं आता और हद तो ये है कि ऐसी स्थिति होने पर भी नारी अपनी ऐसी भावनाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती . ऐसे ही बड़े बड़े दावे किये जाते हैं कि लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं ,सत्य है ,डाक्टर बन रही हैं इंजीनियर बन रही हैं साथ ही बहुत बड़ी संख्या में टीचर बन रही हैं किन्तु ये ऊपरी सच है अंदरूनी हालात- *-इंजीनियर रीमा मेरिट में स्थान बना बनती है और बेवकूफ बनती है अपने साथी लड़के से ,शादी करती है किन्तु नहीं बनती और माँ बाप कुंवारी बता उसकी दूसरी शादी करते हैं ,क्यूं बढ़ जाते हैं उसके कदम आधुनिकता की होड़ में स्वयं को सक्षम निर्णय लेने वाला दिखाने में और अगर बढ़ जाते हैं तो क्यूं नहीं निभा पाती उस प्यार को जो उसे सामाजिक मर्यादाओं से बगावत को मजबूर करता है और फिर क्यूं लौट आती है उन्हीं मर्यादाओं के अधीन जिन्हें कभी कोरी बकवास कह छोड़ चुकी थी ?क्या यही है सशक्तिकरण ? *कस्बों में लड़कियां बारहवीं पास करते ही वहां के स्कूलों में पढ़ाने जाने लगी हैं .''जॉब ''कर रही हैं ,स्वावलंबी हो रही हैं ,कह सिर गर्व से ऊँचा किये फिरते हैं सभी फिर क्यों लुट रही हैं ,क्यों अपनी तनख्वाह नहीं बताती ,क्यों ज्यादा तनख्वाह पर साइन कर कम वेतन ख़ुशी ख़ुशी ले रही हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ? *पंचायतों में ,नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हो रहे हैं ,महिलाएं चुनी जा रही हैं ,शासन कर रही हैं सुन गर्व से भर जाती हैं महिलाएं ,फिर क्यूं पंचायतों की ,नगरपालिकाओं की बैठकों में अनुपस्थित रहती हैं ,क्यों उनकी उपस्थिति के साइन तक उनके पति ही करते हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ? *बैनामे संपत्तियों के महिलाओं के नाम हो रहे हैं ,महिलाएं संपत्ति की मालिक हो रही हैं ,क्या नहीं जानते हम कि मात्र स्टाम्प ड्यूटी घटाने को ये स्वांग भी पुरुष ही रच रहे हैं ,कितनी सही तरह से संपत्ति की मालिक हो रही हैं महिलाएं स्वयं भी जानती हैं ,क्या वे अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल कर सकती हैं ,क्या वे स्वयं उसे बेच सकती हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ? वास्तविकता यही है कि नारी कभी भी पुरुष की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकती क्योंकि ये गुलामी उसने स्वयं चुनी है .वह स्वयं उसके हाथों की कठपुतली बनी रहना चाहती है .पुरुष ने उसे हमेशा गहनों ,कपड़ों के लोभ में ऐसे जकड़े रखा हैं कि वह कहीं भी हो इनमे ही सिमटकर रह जाती है .पुरुष के इस बहकावे में नारी इस कदर फंसी हुई है कि बड़ी से बड़ी नाराजगी भी वह उसे कोई गहना ,कपडा देकर दूर कर देता है और वह बहकी रहती है एक उत्पाद बन कर .यही सोच है कि पढ़ी लिखी वकील होने के बावजूद फिजा चाँद के शादी व् बच्चों के बारे में जानते हुए भी उसकी पत्नी बनाने के बहकावे में आ जाती है और समाज में उस औरत का दर्ज पा जाती हैं जिसे ''रखैल''कहते हैं .यही सशक्तिकरण का ढोंग है जिसमे फिल्मो में ,मॉडलिंग में लड़कियां अपना तन उघाड़ रही हैं ,वही स्वयं को सशक्त दिखाने की पहल में यही हवा हमारे समाज में बही जा रही है .फिल्मो में शोषण का शिकार हमारी ये हीरोइने तो इस माध्यम से नाम व् पैसा कमा रही हैं किन्तु एक सामान्य लड़की इस राह पर चलकर स्वयं को तो अंधे कुएं में धकेल ही रही है और औरों के लिए खाई तैयार कर रही है .फिर क्यों आश्चर्य किया जाता है बलात्कार ,छेड़खानी की बढती घटनाओं पर ,ये तो उसी सशक्तिकरण की उपज है जो आज की नारी का हो रहा है और परिणाम सामने हैं उसे केवल यही सुनता है जो पुरुष सुनाता है - ''है बनने संवरने का जब ही मज़ा , कोई देखने वाला आशिक भी हो .'' नहीं सुनती उसे वह करूण पुकार जो कहती है - ''दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है , उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है .'' .इसी सोच के कारण अपने आकर्षण में पुरुष को बांधने के लिए वह निरंतर गिरती जा रही है और स्वयं को सशक्त दिखाने के लिए फांसी पर चढ़ती जा रही है . शालिनी कौशिक [कौशल ]

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शालिनी कौशिक एडवोकेट

कहते हैं ये जीवन अनेकों रंगों से भरा है संसार में सभी की इच्छा होती है इन रंगों को अपने में समेट लेने की मेरी भी रही और मैंने बचपन से आज तक अपने जीवन में अनेकों रंगों का आवागमन देखा और उन्हें महसूस भी किया .सुख दुःख से भरे ये रंग मेरे जीवन में हमेशा ही बहुत महत्वपूर्ण रहे .एक अधिवक्ता बनी और केवल इसलिए कि अन्याय का सामना करूँ और दूसरों की भी मदद करूँ .आज समाज में एक बहस छिड़ी है नारी सशक्तिकरण की और मैं एक नारी हूँ और जानती हूँ कि नारी ने बहुत कुछ सहा है और वो सह भी सकती है क्योंकि उसे भगवान ने बनाया ही सहनशीलता की मूर्ति है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल नारी ही सहनशील होती है मैं जानती हूँ कि बहुत से पुरुष भी सहनशील होते हैं और वे भी बहुत से नारी अत्याचार सहते हैं इसलिए मैं न नारीवादी हूँ और न पुरुषवादी क्योंकि मैंने देखा है कि जहाँ जिसका दांव लग जाता है वह दूसरे को दबा डालता है.

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यथार्थ है

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