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कहीं मत जाना तुम -- कविता

19 मार्च 2017   |  रेणु
कहीं   मत जाना तुम -- कविता

बिनसुने - मन की व्यथा --

दूर कहीं मत जाना तुम !

किसने - कब- कितना सताया -

सब कथा सुन जाना तुम ! !

जाने कब से जमा है मनमे --

दर्द की अनगिन तहें ,

जख्म बन चले नासूर अब तो -

लाइलाज से हो गए ;

मुस्कुरा दूँ मैं जरा सा --

वो वजह बन जाना तुम ! !

रोक लूंगी मैं तुम्हे -

किसी पूनम की चाँद रात में ,

उस पल में जी लुंगी मैं-

उम्र सारी - तुम्हारे साथ में ;

नील गगन की छांव में बस -

मेरे साथ जगते जाना तुम !

एक नदी बाहर है -

इक मेरे भीतर थमी है ,

खारे जल की झील बन जो -

कब से बर्फ सी जमी है ;

ताप देकर स्नेह का -

इसको पिंघला जाना तुम ! !

साथ ना चल सको -

मुझे नहीं शिकवा कोई ,

मेरे समानांतर ही कहीं -

चुन लेना सरल सा पथ कोई ;

निहार लूंगी मैं तुम्हे बस दूर से -

मेरी आँखों से कभी- ओझल ना हो जाना तुम ! !

बिनसुने -- मन की व्यथा -

दूर कहीं मत जाना तुम ! ! !


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