हिमालय - वंदन ----------- - कविता

01 अप्रैल 2017   |  रेणु   (1010 बार पढ़ा जा चुका है)

हिमालय -  वंदन   ----------- - कविता

सुना है हिमालय हो तुम !

सुदृढ़ , अटल और अविचल -

जीवन का विद्यालय हो तुम ! !

शिव के तुम्ही कैलाश हो -

माँ जगदम्बा का वास हो ,

निर्वाण हो महावीर का --

ऋषियों का चिर - प्रवास हो ;

ज्ञान - भक्ति से भरा -

बुद्ध का करुणालय हो तुम ! !

युगों से अजेय हो --

वीरों की विजय हो तुम ,

लालसा में शिखर की -

साहस का गन्तव्य हो तुम ;

संघर्ष का उत्कर्ष हो -

नीति का न्यायालय हो तुम ! !

कवियों का मधुर गान हो -

मुरली की मीठी तान हो ,

शीतल उच्छवास हो सृष्टि का -

राष्ट्र का अभिमान हो ;

नभ के संदेशे बांटता -

मेघों का पत्रालय हो तुम ! !

हिम - शिखरों से सजा --

माँ भारत का उन्नत भाल हो ,

टेढ़ी नजर से ताकते -

शत्रु का महाकाल हो ;

कण -कण में बसा भारत जिसमे -

कश्मीर से मेघालय हो तुम ! !

सुदृढ़ , अटल और अविचल -

जीवन का विद्यालय हो तुम ! !

सुना है हिमालय हो तुम -------- ! ! !




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रवि कुमार
21 अप्रैल 2017

वाह , बहुत ही खूब रेणु जी ....

रेणु
25 अप्रैल 2017

रवि भाई आपका धन्यवाद उत्साहवर्धन के लिए

बहुत बडिया

रेणु
15 अप्रैल 2017

देवासी जी -- स्वागत है आपका --

रश्मि प्रभा
06 अप्रैल 2017

माँ भी तुम
पिता भी तुम
सखा भी ... तुम्हारे साथ हम कितने सुरक्षित

महातम मिश्रा
03 अप्रैल 2017

सुना है हिमालय हो तुम, वाह वाह क्या कहन है आदरणीया, नमन लेखनी को, हार्दिक बधाई

रेणु
06 अप्रैल 2017

आदरणीय मिश्रा जी -- आपका हार्दिक आभार !

वाहहहह वाहहह अदभुत रचना

रेणु
03 अप्रैल 2017

आभार हेम !

विश्वमोहन
01 अप्रैल 2017

जननी के हिम किरीट की अभ्यर्थना में गाये गए गीत की भाषा भी सागरमाथा की तरह दिव्य , विराट! आपकी लेखनी से भाव प्रवणता उसी कल कल गति से प्रवाहित हो रही है जैसे हिमालय की गोद से निःसृत गंगा! आपकी लेखनी की प्रांजलता अमर हो. बधाई!

रेणु
01 अप्रैल 2017

आदरणीय विश्वमोहन जी -- हार्दिक आभार आपका - इस अभूतपूर्व उत्साहवर्धन के लिए ! !

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