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जिन्हें न शर्म लेश

05 अप्रैल 2017   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट

जिन्हें न शर्म लेश

बहुत बार देखी हैं

हथेली की रेखाएं

किताबों में लिखा

जिन्हें सर्वश्रेष्ठ ,

उमर आधे से ज्यादा

है बीत गयी

खोया ही खोया

पाया बस क्लेश ,

नहीं कोई चाहत

है अब पाल रखी

नहीं लेना दुनिया

से है कुछ विशेष ,

सुकूँ से बिता लें

सम्मान से रह लें

जो चार दिन

इस जहाँ में अवशेष ,

मगर लगता लड़ना

व् भिड़ना पड़ेगा

सबक दे दें उनको

जिन्हें न शर्म लेश .


शालिनी कौशिक

(कौशल)


शालिनी कौशिक एडवोकेट

कहते हैं ये जीवन अनेकों रंगों से भरा है संसार में सभी की इच्छा होती है इन रंगों को अपने में समेट लेने की मेरी भी रही और मैंने बचपन से आज तक अपने जीवन में अनेकों रंगों का आवागमन देखा और उन्हें महसूस भी किया .सुख दुःख से भरे ये रंग मेरे जीवन में हमेशा ही बहुत महत्वपूर्ण रहे .एक अधिवक्ता बनी और केवल इसलिए कि अन्याय का सामना करूँ और दूसरों की भी मदद करूँ .आज समाज में एक बहस छिड़ी है नारी सशक्तिकरण की और मैं एक नारी हूँ और जानती हूँ कि नारी ने बहुत कुछ सहा है और वो सह भी सकती है क्योंकि उसे भगवान ने बनाया ही सहनशीलता की मूर्ति है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल नारी ही सहनशील होती है मैं जानती हूँ कि बहुत से पुरुष भी सहनशील होते हैं और वे भी बहुत से नारी अत्याचार सहते हैं इसलिए मैं न नारीवादी हूँ और न पुरुषवादी क्योंकि मैंने देखा है कि जहाँ जिसका दांव लग जाता है वह दूसरे को दबा डालता है.

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