तुलसी के राम

06 अप्रैल 2017   |  रेणु   (1146 बार पढ़ा जा चुका है)

तुलसी के  राम

श्री राम कृष्ण भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग और परिचायक हैं |कहते हैं यदि भारतीय संस्कृति और समाज में से राम और कृष्ण को निकाल दिया जाये तो वह शून्य नहीं तो शून्य प्राय अवश्य हो जायेगी | दोनों ही भारतीय समाज के जननायक नहीं बल्कि युग नायक हैं | जहाँ श्री कृष्ण के बालपन , किशोरावस्था व युवावस्था के अनेक सन्दर्भ उन्हें एक चंचल बालक , अप्रतिम प्रेमी व् कुटनीतिक नायक के रूप में परिभाषित करते हैं ,वहीँ श्री राम मर्यादा , शील व धीरज के शिखर पुरुष कहे जा सकते हैं | एक सभ्य समाज को सदैव ही ऐसे व्यक्ति पसंद आते हैं जो हर प्रकार से लोक हितैषी हो | श्री राम ऐसे ही लोक नायक हैं जो ना केवल पौरुष सौन्दर्य से भरपूर हैं बल्कि स्वाभिमान व जनहित के लिए एक समर्थ योद्धा भी हैं | श्री राम को करुणानिधान भी कहकर पुकारा गया है, वे ना केवल मानव जाति बल्कि संसार के सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं | श्री राम भगवान् विष्णु के त्रेता युगीन अवतार माने जाते हैं | श्री राम की कहानी भारतीय समाज में इस तरह से व्याप्त है कि उसके बिना नैतिकता के समस्त मापदंड अधूरे है अर्थात राम आलौकिक - दिव्य पुरुष नहीं हैं- वे पुरुष हैं पर नैतिकता , शिष्टाचार और मर्यादा के शिखर पुरुष भी हैं कोई आम जन नहीं | उन्होंने रामावतार के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम बन मानव जीवन जिया और गाय, ब्राहमण देवता और संतजनों आदि का हित किया | श्री राम का जो रूप जन – जन में लोकप्रिय है उसे लोगों के अंतस में बसाने का काम भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने बखूबी किया है | क्योकि तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में प्रभु श्री राम के अनेक रूपों का अपनी सरल व सरस भाषा में वर्णन कर उन्हें जन जन के ह्रदय में बसा दिया है | उनके नायक राम के विभिन्न रूप है | ऐसा माना जाता है कि संसार में अवतारों का अवतरण का कारण लोककल्याण है | जब - जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म का बोलबाला होता है तभी भगवान् कोई अवतार धारण कर संसार को इस अधर्म की पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं | वे जब संसार में प्रकट होते हैं – तब उनका रूप दिव्य होता है -- | तुलसीदास जी ने भगवान् के इस दिव्य रूप को अपनी सरस वाणी में यूँ शब्दांकित किया है ---

भये प्रकट कृपाला दीनदयाला – कौशिल्या हितकारी |

हर्षित महतारी मुनिमनहारी -अद्भुत रूप निहारी | |

लोचनअभिरामा तनु घनश्यामा –निज आयुध भुजचारी |

भूषण वनमाला नयन विशाला शोभासिंधू करारी | |

अर्थात जब कृपालु , दीनों पर दया रखने वाले और कौशल्या माँ के हितकारी भगवान् राम प्रकट हुए तब उनका उनका अनुपम रूप निहारकर माँ दंग रह गई ! ! प्रभु के नेत्र सुंदर है और शरीर का रंग सांवला , चारो भुजाओं में शस्त्र अर्थात शंख , गदा पद्म चक्र आदि धारण किये हुए हैं | सारे अंग आभूषणों और वन माला से सुशोभित हैं | जिनके विशाल नेत्र हैं , जो शोभा के सागर और खर नामक राक्षस के शत्रु हैं जिनकी शोभा को देखकर मुनि लोगों के मन भी मोहित हो जाते हैं | तुलसी दास जी की ने इसके बाद श्री राम के अनेक रूपों का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है , जिनमे माँ दवारा राम को निहारकर अपना भाग्य सराहना और पालने में झुलाने के साथ – साथ उनके बचपन के अनेक रीती - संस्कारों के चित्र मानस में खींचे हैं | एक संस्कारी पुत्र हैं जो प्रातकाल उठकर माता – पिता और गुरु को सिर नवाकर प्रणाम करते हैं ----

प्रातकाल उठके रघुनाथा – मात –पिता , गुरु नावहिं माथा |

वे ना केवल आज्ञाकारी पुत्र हैं बल्किकिशोरावस्था में भी एक कुशल योद्या हैं जो खर – दूषण और ताड़का आदि राक्षसों का संहार करते हैं | वे एक दिव्य पुरुष भी हैं जिनके पैर के स्पर्श मात्र के पत्थर की शापित अहिल्या अपने पूर्व मानव रूप में वापस आ जाती है | आगे चलकर सीता को देख प्रथम दृष्टि में ही उन पर मोहित हो वे अपने अनन्य प्रेमी होने का प्रमाण देते हैं वे कहते हैं ---

जासु विलोकि आलौकिक शोभा –सहज पुनीत मोर मन छोभा|

अर्थात सीता की आलौकिक रूप संपदा को निहार कर वे अपने मन में उपजे क्षोभ की स्वीकारोक्ति बड़ी शिष्टता और व्यावहारिक रूप से करते हैं |यानि अपने सहज पवित्र मन को सीता के प्रति आकृष्ट होने पर वे इसे अपने छोटे भाई लक्षमण से छुपाना नहीं चाहते पर बड़ी ही शिष्टता से बताकर अपने सहज स्वभाव की पारदर्शिता को दिखाते हैं | श्री राम आजीवन एक पत्नीव्रत ले कर समस्त नारी जाति के आदर्श पुरुष कहलाये | श्री राम का अपने तीनों भाइयों के साथ स्नेह अपार है | जीवन से अनंत में समाने तक वे अपने भाइयों के प्रति अतुलनीय स्नेह का प्रदर्शन कर समाज में सहोदरों के आपसी प्रेम की नई गाथा लिखते है ,जो कि भारतीय समाज में युगों से प्रेरणा बिंदु है |जब श्री राम सौतेली माँ कैकयी की आज्ञा से वनगमन के लिए तापस वेश धारण का निकल पड़ते हैं और उनके भाई भरत ननिहाल से वापस आते है तो कौशल्या माँ से राम के वन गमन के विषय में प्रश्न कर अपने प्रति संशय प्रकट करते हैं कि कही राम उन्हें सारे घटनाक्रम के लिए दोषी तो नहीं मान रहे | तब माँ कौशल्या राम के वन गमन का इन शब्दों में वर्णन करती हैं ‘ मुख प्रसन्न मन राम न रोषु -सब कर सब विधि कर परितोषु

अर्थात जब राम वन के लिए चले तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी , कोई राग , द्वेष या किसी भी प्रकार का रोष नहीं | सब को सब प्रकार से संतुष्ट कर ने बाद ही वे वन गए | यहाँ राम के आंतरिक संतुलन से भरे वैरागी रूप अर्थात ‘ जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ‘ के दर्शन होते हैं | जिस राम को सुबह अयोध्या के राजा के रूप में राज तिलक होना था , पर उस साम्राज्य के राजा बनने के स्थान पर उन्हें अप्रत्याशित रूप से वनवास के लिए जाना पड़ा इस बात को वे रोकर या आक्रोश निकालकर सहन नहीं करते बल्कि नियति के इस रंग को प्रसन्नता और सहजता से शिरोधार्य करते हैं और अपने परम वैरागी रूप में दिखाई पड़ते हैं | राम के पिता रूप का भले ही तुलसीदास जी ने अधिक वर्णन नहीं किया पर ‘’मिले तनय दोनों उर लाई ‘’ लिख कर वे राम जी के पिता रूप का सजीव वर्णन करते हैं | तुलसीदास जी ने श्री राम के एक और रूप को बड़ी की भावप्रणवता से अपनी कालजयी कृति में शब्दांकित किया है | वह है श्री राम का श्रम जीवी रूप यानी सांवल वर्ण | उनके संघर्षशील व्यक्तित्व में इस श्याम अथवा नील वर्ण का बहुत महत्व है | सदियों से सांवले व्यक्ति को श्रम प्रधान छवि के रूप में देखा गया है और राम भी ज्यादातर जीवन मानवता के लिए त्याग ,युद्ध , आदर्शों की प्रतिस्थापना के लिए वनवास के रूप में बाहर खुले प्रकृति की गोद में गुजारते हुए अनथक श्रम का विधान रचते हैं , यही कारण है कि तुलसीदास जी राम के पौरुष सौदर्य का वर्णन करते समय उनके सांवले माथे पर पनपी पसीने की बूंद का विशेष रूप से उल् लेख करते हैं और और उसे ‘ श्रमबिंदु सोहाए ‘ की उपमा से अलंकृत करते हैं | यानि पसीने को मेहनत का अद्भुत प्रतीक मान कर श्री राम के सन्दर्भ में श्रम को महत्व दिया है | अर्थात श्रम किसी भी सभ्यता की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है -ये माना गया है -- साथ ही इंगित किया गया है जो कौम श्रम की अवहेलना करती है उसका विलुप्त होना तय है | तुलसी के राम सम भाव वाले है निषाद हों या शबरी , जटायु हो या केवट अथवा बन्दर भालू राम की दृष्टि सबको एक सामान आत्मीयता से निहारती है | हनुमान को वे अपने भाई भरत तुल्य मानते हैं – और तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई –-- कहकर अपना अनन्य स्नेह प्रदर्शित करते हैं | यही आभार वे सुग्रीव - विभीषण , जामावन्त अंगद , नल नील आदि के साथ प्रकट करते हैं और बताते हैं कि उनके सहयोग के बिना लंका विजय हरगिज संभव नहीं थी | राम के आराध्य भोलेनाथ शिव हैं तो शिव जी हर समय श्री राम के चिंतन में अपना समय बिताते हैं | इन दोनों के एक दुसरे को अपना अभिन्न अंग बताते तुलसीदास जी ने राम जी को शिव के अनन्य आराधक के रूप में परिभाषित किया है | और रामायण में शक्ति पूजा के रूप में राम की नारी शक्ति के प्रति आस्था को दर्शाया गया है | इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसी के राम अपने जीवन में अनेक आदर्श रूपों को जीते हुए आराध्य और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हर भारतवासी के अतःकरण में सदैव विराजते हैं | सब से मुख्य सन्देश गोसाई जी इन पंक्तियों के रूप में देते हैं ------

-- सिया राम मय सब जग जानि --- करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी | |

अगला लेख: गंगा -- यमुना कब ना थी ज़िंदा इकाई ?


अभिषेक राणा
13 जुलाई 2017

बहुत अच्छी रचना

महातम मिश्रा
12 अप्रैल 2017

तुलसी के राम का अति सुंदर दर्शन प्रस्तुत किया है आप ने आदरणीया, सारगर्भित सार को पढ़कर मन में लगा कि परिपक्वता ही प्रखरता को प्रखर करती है, जिस संजीदगी और यथोचित भाव का दर्शन हुआ है उसका कोई जोड़ नहीं है ॐ जय श्रीराम, नमन लेखनी को

रेणु
14 अप्रैल 2017

आदरणीय मिश्रा जी आपका हार्दिक धन्यवाद कि आपने इस छोटी सी कोशिश के मर्म को समझा ---

Astro Matadin Jyotishi
09 अप्रैल 2017

#AstroMatadinJyotishi ⛳ 🌹ॐ ☎#+91-7508605720 _★★ माता- बहनो के समाधान में विशेष छूट CALL_NOW #LoveGuru (#VashikaranSpecialistInAmritsar)(फ़ीस_काम_होने_के_बाद) #Call_now_जैसा_चाहोगे_वैसा_होगा What's up No ☎#+91-7508605720 Guru ji (माँ कामाख्या की शक्तिः मेरी भक्ति) जब_कंही_ना_बने_काम_तो_हमसे_ले_समाधान world famous greatest astrologer #LoveGuru get all problem solutions in your life mob:~ ☎ ☎#LoveGuru #VashikaranSpecialistInAmritsar #Call_now_जैसा_चाहोगे_वैसा_होगा+91-7508605720 1-प्रेम समस्या का समाधान 2- वशीकरण का समाधान 3-पति पत्नी के रिश्ते समस्या समाधान 4 व्यापार में नुकसान 5-तलाक की समस्याओं को हल 6-निःसंतान समस्या का समाधान 7-प्रेम समस्या का समाधान 100% 8. लॉटरी नंबर #100% समाधान पाये सिर्फ 5 घंटो में नोट:- विश्वाश_ही_परमात्मा_हे_!! ⛳ 🌹ॐ ☎Call #LoveGuru #Call_now_जैसा_चाहोगे_वैसा_होगा+91-7508605720 #VashikaranSpecialistInAmritsar

भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषताएं ही दुनिया को आज तक अपनी ओर खींचने का आकर्षण बनाये हुए हैं क्योंकि यह सिद्धांतों एवं मूल्यों पर आधारित धरोहर है . एक सारगर्भित व विचारणीय आलेख जोकि समय की मांग के अनुसार नयी पीढ़ी को पढ़ना चाहिए .

रेणु
10 अप्रैल 2017

रविंद्र जी आपका हार्दिक धन्यवाद कि आपने रचना को पढ़ने का समय दिया --

विश्वमोहन
06 अप्रैल 2017

' तुलसी ' के राम का सर्वांगीण चित्र इतनी संजीदगी से आपने परोसा मानो तुलसी स्वयं अपने मानस की गद्यात्मक व्याख्या करने बैठे हो। हालांकि तुलसी के परमात्म स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम मेरी दृष्टि में भटकते जीव मात्र हैं:-
धन्य जनक धन जानकी तोरी।
और धन्य! वसुधा का भ्रूण।।
अशोक वाटिका कलुषित कारा।
जग जननी पावन अक्षुण्ण।।
प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में।
कौन है हारा और कौन जीता।।
राम भटकता जीव मात्र है।
परम ब्रह्म माँ शक्ति सीता।।
अपनी अपनी व्याख्या! हालांकि मूल बात ये है के समाज की सभ्यता के निर्माण का यह उद्भव काल था जब नए मूल्य गढे जाने थे। क्रोंच के कामातुर प्रेमी नर जोड़े के वध से वेदना का जो ज्वार वाल्मिकी के मन मे फूटा उस करुणा से प्रसूत श्लोक में नारद ने राम की कथा को बांध दिया।यह संभवतः नए निर्मित होते समाज को मर्यादाओं में उत्कीलित करने का पुनीत प्रयास था।वाल्मिकी ने इसे अपने सुसंस्कृत देव् छन्दों में सजाकर राम को उन मर्यादाओ का प्रतीक संकेत बना दिया तो फिर तुलसी ने अपनी लोक भाषा मे इस मर्यादा पुरुष को लोकनायक बना दिया।
आपकी विलक्षण प्रस्तुति के लिए साधुवाद और शुभ कामनाएं!!!

रेणु
10 अप्रैल 2017

सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें

शब्दनगरी से जुड़िये आज ही

सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
लोकप्रिय प्रश्न
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x