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अमरुद चुराने आ गई बच्चों की टोली --- कविता --

11 अप्रैल 2017   |  रेणु

अमरुद   चुराने  आ  गई     बच्चों  की टोली --- कविता --

अमरुद चुराने आ गई बच्चों की टोली ,

पेड़ को रह रह ताक रही हैं उनकी नजरे भोली ! !


हरे भरे पेड़ पर लदे हैं -फल आधे कच्चे आधे पक्के

बड़ी ललचाई नजरों से ताके जाते हैं बच्चे ;

कई तिडकम भिड़ा रहे भीतर ही भीतर

होगे सफल बड़े हैं धुन के पक्के ;

देख -समझ ना कोई उनकी बाते –

इक दूजे से संकेतों में बतियाते सब हमजौली ! !


कुछ गली में खड़े दीवार से टेक लगाये ,

एक झुका -- दूजे को कंधे पे चढ़ाए ;

बाकि सब की पहरा दे रही चौकन्नी निगाहें –

ज़रा सी आहट पे भाग ले पैर सर पे उठाये ;

बस कुछ पल की बात है काम निपट जाये-

हैं कोशिश में फलों से भर जाये झोली ! !


एक नन्हा बच्चा चढ़ बैठा मोटी टहनी के ऊपर –

फैक रहा अमरुद तोड़ - नीचे वालों के ऊपर ;

पाया मानों पल में जग भर का खजाना –

लगे समेटने फल बच्चे बडे खुश होकर ;

बड़ी कशमकश में हैं कुछ ज्यादा मिल जाये

जल्द ख़त्म हो जाए ये आंखमिचौली ! !


चुपके से बाहर झाँका तो मेरी आँखें भर आईं -

शुक्र है बच्चों में बचा है बचपन ये बात मन भाई -

किताबों के बोझ तले दबे थे नन्हे बच्चे -

निकले कुछ बाहर - इनकी दुनिया मुस्काई ;

चोरी के फल पाकर खिल गए सबके चेहरे

छोटी सी ख़ुशी ने नन्हे मनों की गांठे खोली ! ! !


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