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सांस्कृतिक चेतना का पर्व -- बैशाखी

14 अप्रैल 2017   |  रेणु

सांस्कृतिक  चेतना का  पर्व --  बैशाखी

जीवन में इंसान हर रोज अनेक प्रकार के संघर्ष , कुंठाओं बेबसी , अभाव और पीड़ा आदि से रु - - रु होता है | भले ही वह बाहर से कितना भी प्रसन्न और सुखी क्यों ना हो एक उदासी किसी ना किसी कारण से उसके भीतर पसरी रहती है | पर साल भर यदा कदा मनाये जाने वाले उत्सव और पर्व हमारी उदास और नीरस जिंदगी में रंग भरने का काम बखूबी करते हैं | ये पर्व हमारे अंदर बाहर असीम ऊर्जा का संचार कर हमारे तन - मन दोनों में आनंद और उल्लास भर देते हैं | बैशाखी ऐसा ही रंगीला सांस्कृतिक पर्व है जो जब आता है समाज की जड़ता को छिन्न- बिन्न करता हुआ इसमें नई चेतना जगाता है | उत्तर भारत विशेषकर पंजाब - हरियाणा में मनाये जाने वाले इस पर्व से पूरा भारतवर्ष परिचित है | लोक रंग से सजा ये त्यौहार हर वर्ष अप्रैल महीने की 13 या14तारीख को मनाया जाता है |इसी दिन सूर्य भी मेष राशि में प्रवेश करता है और मेष संक्रांति भी इसी दिन मनाई जाती है | सिख धर्म में नए साल का शुभारम्भ भी इसी दिन से होता है | इस उपलक्ष्य में लोग एक दूसरे को बधाइयाँ देकर अपनी शुभकामना प्रेषित करते हैं ये समय रबी की फसलों की कटाई की शुरुआत का भी होता है | खेतों में लहलहाती फसल से किसान का मन आनंद से भर जाता है और उसका मन उमंग में भर गा उठता है | सचमुच यह पर्व धरतीपुत्र किसान के अदम्य और संघर्ष को समर्पित है | वह अपने मन के उल्लास को ढोल की थाप पर भंगड़ा डाल और गा कर कर प्रदर्शित करता है | पंजाब में अनेक गीत और लोक गीत इस अनूठे उत्सव को समर्पित हैं जिनमे जीवन की अनेक खुशियों और सामानांतर ही पीड़ा को भी भावभीने रंगों में पिरोया गया है | पंजाब के लोगों ने बदलते समय में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को बखूबी संभाल कर रखा है | वे अपनी ख़ुशी को जताने का एक भी मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते | जब लोग वस्त्रों में सज - धज कर चलते हैं तो समाज में नया लोकवैभव दिखाई पड़ता है |अनेक जगहों पर लोकमेलों का भी आयोजन किया जाता है | सिख धर्म में यह त्यौहार आध्यात्मिक महत्व को भी दर्शाता है | इसी दिन सिंखों के दसवें गुरु -- गुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की नींव रखते हुए चिरंतन काल तक जीवन की कामना रखने वाले जड़ बुद्धि लोगों को ललकारा था कि यदि वे जीना चाहते हैं तो उन्हें मरने की कला सीखनी होगी | उन्होंने जीवन्मुक्त होने का आह्वान किया | उन्होंने अपनी कर्मठता और आत्म - विश्वास से मानसिक दासता के बंधन तोड़ने के लिए लोगों को ललकारा क्योकि मुग़ल शासकों के अत्याचारों से पीड़ित लोगों के लिए मुक्ति का एक मात्र यही साधन था | जैसा कि शेख फरीद ने भी लिखा है –

फरीदा बारि पराये बैसणा—साईं मुझे ना देहि ---

जो तू ऐवे रखसी जिउ शरिरिहूँ लेहि--- अर्थात हे साईं मुझे पराये लोगों में मत बसाना -- यदि [ किसी कारण से] ऐसे रखोगे तो इससे अच्छा है , मेरे प्राण शरीर से हर लेना अर्थात निकाल लेना | दूसरे शब्दों में उन्हें गुलामी का जीवन तनिक भी स्वीकार्य नहीं था | इसी क्रम में सिख धर्म के सभी गुरुओं ने सामाजिक उत्थान में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया और लोगों को चैतन्य से भर उन्हें अपने कल्याण का मार्ग दिखाया | सबसे बड़ी बात गुरु नानक देव जी ने सामाजिक रूप से उपेक्षित लोगों को गले लगाया और खुद को भी उन्ही में से एक जता कर उन्हें बराबरी का दर्जा दिया और वे कह उठे – ‘

नीचां अन्दर नीच जात –निचिहूँ अति नीचू’

इस तरह से उन्होंने ने समाज में एकता का आह्वान करते हुए दलित लोगों को बहुत ऊँचा स्थान दिया| और अपने आपको उन्ही के बराबर जता कर उनका आत्मविश्वास बढाया | इस तरह की अनेक अध्यात्मिक घटनाओं का गवाह बैशाखी का पर्व बना | गुरु गोबिंद सिंह जी ने सन 1699 में इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना के साथ पञ्च प्यारों को मानवता के लिए सर्वोच्च बलिदान के लिए प्रेरित किया और स्वयं की भुजाओं और मन की शक्ति पहचानने को कहा |

वे सिंह की भांति दहाड़ उठे --------------------------------------

यह तो है घर प्रेम का खाला का घर नाहि---

शीश उतारे भूई धरे तब बैठे इह माहि ---

इन पांच प्यारों के आत्मोत्सर्ग की भावना से हजारों लोगों को प्रेरणा मिली और वे गुरु जी के साथ इस मानवता के उत्थान की यात्रा में शामिल हो गए | इस प्रकार बैसाखी पर गुरु जी ने उत्साही लोगों को एकत्र कर उन में नई चेतना का संचार किया | आज भी उन्ही दिनों की गौरवशाली यादों को जीते हुए गुरुद्वारों में विशेष भजन कीर्तन और लंगर का आयोजन किया जाता है जिनमे लोग जाति और धर्म का भेदभाव भूल कर बड़ी ही श्रद्धा से शामिल होते हैं | सच तो ये है कि बैशाखी एक आम पर्व नही सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख त्यौहार है | जिसने पंजाब ही नहीं समूचे उत्तर भारत को समस्त विश्व में अलग पहचान दिलाई है |


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