कविता के गांव में

15 अप्रैल 2017   |  अनिल कुमार शर्मा   (72 बार पढ़ा जा चुका है)

कविता के गांव में

कविता के गाँव में

कविता के गाँव में

कई तरह की कलम उगी थी

कोई फूली थी कोई पचकी थी

कोई स्याही में डूबी थी

कोई लिखकर टूटी थी

प्राचीन नदी के किनारे

एक प्राचीन कुटी थी

अबूझ भाषाओँ की चीख

समय के जंगल में गूंजी थी

सूने कान में आवाजों के डोरे

सूत्र बन जिह्वा पर बोले

ध्वनि के चित्र खोले

कविता विचित्र हो

संतप्त जीवन की

आह्लाद भरी मित्र हो

वाल्मीकि नहा रहे थे

दो परिंदे पेड़ पर हनीमून मना रहे थे

ब्याध ने बाण छोड़ दिया

कॉमेडी को ट्रेजेडी में मोड़ दिया

कवि हृदय की आह छूट पड़ी

कविता वही से फूट पड़ी

यह सद्पीड़ा की अनुभूति है

चेष्टाओं की विभूति है

कविता शिशु के मुँह में

माँ के चुचूकों की प्रथम धारोष्ण दुग्ध है

जो उसके किलकारियों से अतिशय मुग्ध है

अनिल कुमार शर्मा

15/04/2017

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अनिल कुमार शर्मा

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लेखक 1
रेणु
16 अप्रैल 2017

आदरणीय अनिल जी कविता का गांव बड़ा सुहावना है ----

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