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कुछ की आदत होती है

19 अप्रैल 2017   |  जयति जैन

आधे लोग तो बस इसीलिये बक बकाने लगते हैं कि - लडकी है और इतना बोल गयी...

लडकी है और इतना कर गयी... इतने लड़को को सुना दी !

फ़िर कुछ सोचते हैं केसे भी करके इसकी आवाज़ दबा दे ... बस यही वो सबसे बडी भूल कर जाते हैं !

उन्हे लगता है जेसे उनकी घर की औरत े हैं विजि ही और है क्युकिं वो अपने घर परिवार में औरतों पर अपना दबदबा बनाये रखते हैं कि

कहीं औरत सही ना हो जाये, सही हो रहि कहीं, तो चिल्लाना शुरू कर दो ! दो चार मां बाहिन की बोल दो और शान्त हो जायेगि !

लेकिन जब वही दुर्गा बनने की ठान ले तो फ़िर नानी दादी याद आती हैं जो औरते ही होती हैं !

एक आदमी बोला किसी बात के लिये तो 2-3 तो अपनी धाक जमाने के लिये बीच मे कून्द पडते हैं, भले अता पता फ़िर कुछ ना हो !
कुछ की आदत होती है आम खाने की तो उन्हे गलत चीजो में भी कुछ ना कुछ अच्छा दिख जाता है और कुछ होते हैं गुठली गिन्ने वाले, हर चीज बुरी, जेसे खुद तो अच्छाई के देवता है ! अफ़सोस गुठली गिन्ने वाले बहुत हैं हम लोगों के करीब ! जो दूसरो को चोट ही पहुचा सकते हैं !


जयति जैन !


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