दास्तान-ए-कलम (मेरी कलम आज रोई थी)

28 अप्रैल 2017   |  एस. कमलवंशी   (379 बार पढ़ा जा चुका है)

दास्तान-ए-कलम (मेरी कलम आज रोई थी)

मेरी कलम आज फिर रोई थी,

तकदीर को कोसती हुई, मंजर-ए-मज़ार सोचती हुई,

दफ़न किये दिल में राज़, ख़यालों को नोंचती हुई।

जगा दिया उस रूह को जो एक अरसे से सोई थी,

मेरे अल्फाज़ मेरी जुबां हैं, मेरी कलम आज रोई थी।।


पलकों की इस दवात में अश्कों की स्याही लेकर,

वीरान दिल में कैद मेरी यादों की दुहाई देकर।

लिखती गई, दुखती गई, हर आह! पर रूकती गई,

खुदा की न कभी कदर की, पर तेरे नाम पर झुकती गई।

फिर लिख दिया मैंने वही, तू भी कभी मेरी ‘कोई’ थी,

वह ‘कोई’ मेरा गवाह है, मेरी कलम आज रोई थी।।


अब कलम मेरी आगे बढ़ी, कुछ और लिखने को चली,

लव के कवाद, फिर शाम-ए-याद, जो तेरी बाँहों में ढली।

तनहाइयां, न अंजुमन, खामोशियाँ, न बाकपन,

फुरकत-ए-तलब, चाहत-ए-अदब, वो तेरे लबों की कली।

तितिली जो इक मुझको मिली, जहाँ को भूल बैठे थे हम,

कुछ याद है गर मुझको अभी, वो तेरे शहर की गली।

बस दर-ब-दर फिरता रहा, नज़रों से मैं गिरता रहा,

महफ़ूज रखा जिनको कभी, वो तेरी यादें थीं भली।

जिस याद में मेरी कलम, कुछ देर तलक खोई थी,

फरियाद करूँ उस याद की, मेरी कलम आज रोई थी।।


दीदार-ए-दरख्त वादा किया, उस चौदवी की रात को,

रुख़सत हुए, ये कुरबत मेरी, न समझे तुम हालात को।

‘कुछ और भी कह न मुझे!’ थी इल्तेज़ा ये उस रात को,

कहता, ‘न जाओ छोड़कर’, गर सुनता वो मेरी बात को।

मुढ़ के इक दफा देखा भी न, उफ! कैसे थे जज़्बात वो,

रो रही थी मेरे साथ जो, बस थी सिर्फ इक कायनात वो।

ख़ाब-ए-मोती वो बिखर गए, जो माला मैंने पिरोई थी,

बिखरे ख़ाब ये कहते हैं, मेरी कलम आज रोई थी।।


फिर सवाल इक मुझको मिला, मेरी इसी किताब में,

क्यूँ अक्स अपना छोड़ गयी, वो मेरे हर इक खुआब में?

मिलता है रोज़ चाँद अब, लग के गले रुसवाई के,

सितारे भी अब जलने लगे, मेरे दिल के इस निसाब में।

मेरी वफ़ा का मुझे, ऐ-खुदा क्या सबब मिला,

लिखा न एक हर्फ़ भी, उसने मेरे जवाब में।

न अब कहीं वो मेरी है, न तब वह मेरी होई थी,

जो न हुई उसे याद कर, मेरी कलम आज रोई थी।।

अगला लेख: अब इतना दम कहाँ!



बहुत ही बेहतरीन रचना एवं कमाल का लेखन है आपका।
मुझे आपकी कविता की हर एक पंक्ति विशिष्ट लगी लेकिन कुछ पंक्तियाँ मेरी अंतरात्मा के इतना बेध गईं कि मैं इन्हें जितनी बार पढ़ता हूँ बरबस मेरी आँखों से आँसू छलक आते हैं।
'लिखती गई, दुखती गई, हर आह! पर रूकती गई,
खुदा की न कभी कदर की, पर तेरे नाम पर झुकती गई।'
एवं
'न अब कहीं वो मेरी है, न तब वह मेरी होई थी,
जो न हुई उसे याद कर, मेरी कलम आज रोई थी।।'

ऋषभ जी आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद। मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि आपका और मेरा हृदय समान पंक्तियों के लिए भर आता है। आपने जो पंक्तियाँ चिन्हित की हैं वे सदा मेरी प्रिय रहेंगी।

फिर सवाल इक मुझको मिला, मेरी इसी किताब में,
क्यूँ अक्स अपना छोड़ गयी, वो मेरे हर इक खुआब में?
मिलता है रोज़ चाँद अब, लग के गले रुसवाई के,
सितारे भी अब जलने लगे, मेरे दिल के इस निसाब में।
लाजवाब पंक्तियाँ ,आदरणीय आभार "एकलव्य"

धन्यवाद एकलव्य जी। :)

सुन्दर ग़ज़ल दिल छू गई, तारीफ करें क्या आपकी।
कमाल का हुनर ह,ै उपमा नहीं जनाब की।

शर्मा जी आपकी शायराना टिप्पणियाँ लाजवाब हैं। धन्यवाद!

अच्छी रचना है | शुभ कामनाएं |

धन्यवाद आलोक जी।

बेहतरीन रचना।

धन्यवाद मिलन।

लेखनी के माध्यम से अपने हृदय के भाव व्यक्त करना कोई आपसे सीखे।
आप अच्छा लिखते हैं।

धन्यवाद सपना जी।

आपका शब्द चयन और लेखन शैली विशिष्ट है।
लिखती गई, दुखती गई, हर आह! पर रूकती गई,
खुदा की न कभी कदर की, पर तेरे नाम पर झुकती गई।
पंकितयों ने हृदय जीत लिया। धन्यवाद

धन्यवाद मौर्य जी। ये पंक्तियां मेरी भी सबसे पसंदीदा पंक्तियाँ है। :)

एस. कमलवंशी
28 अप्रैल 2017

आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद रेणु जी!

रेणु
28 अप्रैल 2017

पर्म पगी बहुत बेहतरीन रचना -- बहुत शुभकामना

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