अब इतना दम कहाँ!

02 मई 2017   |  एस. कमलवंशी   (371 बार पढ़ा जा चुका है)

अब इतना दम कहाँ!

झुक गए हैं कंधे मेरे, अपनों का बोझ उठाते,

सपनों का बोझ उठाऊं, अब इतना दम कहाँ !


कण कण जोड़कर घरोंदा ये बनाया मैंने,

तन-तन मोड़कर इसको सजाया मैंने।

रुक गया हूँ, झुक गया हूँ, बहनों का बोझ उठाते,

गहनों का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!


परिवार की आशाओं में खुद को पिराया मैंने,

बनकर छत उनकी सदा, खुद को भिगाया मैंने।

अकड़न हुई, जकड़न हुई, जाड़े से उनको बचाते,

भाड़े पर खुद को उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!


अधेड़ हूँ, उधेड़-बुन का शिकार, ना! मैं कोई शिकारी नहीं,

साधनों का आभाव है तो माँगता, मैं भिखारी नहीं।

एक खेल है जो खेलता ऊपर खड़ा परवरदिगार,

मैं खेल का बंदर जनाब! जो नाचता, मदारी नहीं।।


हूँ रह रहा उस कैद में, जिससे कोई फरार नहीं,

छलनी हुआ सीना मेरा, कोई देखता दरार नहीं,

लगती है चोट, होता है दर्द, मैं पत्थरों की दीवार नहीं।

किसको खबर कब सोया मैं, मेरा सपनों से तक दीदार नहीं।


मैं घट गया मैं बँट गया, रातों में खुद को जगाते,

कांटों में खुद को सुलाऊँ, अब इतना दम कहाँ!


मजदूर हूँ पैदाइशी, मजदूरी ही कर पाउँगा,

जो बनता है मेरे तन से, मैं उतना ही कर पाउँगा,

मैं थक गया, मैं बिक गया, अब चैन न कुछ पाउँगा

पत्नी, बहन, परिवार वहन, सुत बोझ तले मर जाऊँगा।


मैं तर गया, मैं मर गया, इस धरती का बोझ उठाते,

अपनी अर्थी का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!


*******

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मैं तर गया, मैं मर गया, इस धरती का बोझ उठाते,
अपनी अर्थी का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!
खूबसूरत पंक्तियाँ ,आभार "एकलव्य"

आपकी सराहनीय टिप्पणी के लिए धन्यवाद एकलव्य जी।

धन्यवाद नृपेंद्र कुमार जी। :)

मज़दूर हूँ मज़बूर हूँ,,, समाज का आइना हैं आपके शब्द।

बहुत कठिन है डगर जीवन की. ... जो इतना बोझ उठाना पड़ता है. . परन्तु उठाना तो पड़ेगा ही. #सारांश

बिल्कुल ठीक कहा आपने। नकारात्मकता में सकारात्मक विचार रखने वाला ही सफल जीवन की ओर अग्रसर होगा।

हृदयस्पर्शी चित्रण।

शुक्रिया सपना जी।

गृहस्थ जीवन का करुण विलाप। आपके विचार बहुआयामी हैं।

शुक्रिया प्रवेश जी।

रेणु
02 मई 2017

मन की पीड़ा का अद्भुत आख्यान -- बहुत सुन्दर रचना -- वेरी गुड --

धन्यवाद रेणु जी। एक लेखनी ही है जो मन की पीड़ा को बाँट पाती है वरना मुख से निकले शब्द इस सांसारिक शोरगुल में कौन सुनता है!

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