"बिम्ब सा !" 'कविता'

11 मई 2017   |  ध्रुव सिंह -एकलव्य-   (274 बार पढ़ा जा चुका है)

"बिम्ब सा !"  'कविता'

बिम्ब सा !

दिखता है

मुझको

मन के कोनों में

अभी

कुछ नहीं,

ये भ्रम है !

मेरा

वेदना !

मुझमें कहीं

संभवतः ! हताशा

होगी ये

तोड़ती ! हिम्मत

मेरी

अर्जित नहीं जो

कर सका !

अस्थाई जीवन

में कभी

लूँ सी ! चलतीं

हैं अभी

सफलता ओं की

आंधियाँ

विश्वास का दीपक

है जलता

रह-रहकर ! हृदय में

कहीं

खीजता हूँ ! देखकर

मेले स्थाई

संघर्ष के

मोल ले लूँ !

एक सफलता

असफलताओं के

उत्कर्ष में

विक्रेता बनकर ! है

ठगता

भाग्य कैसा ?

दोमुंहा !

असफलताओं को

कम है

आंके !

एवज में

अस्थाई सफलता



"एकलव्य"





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रेणु
12 मई 2017

आपकी कविता बहुत अच्छी है ध्रुव और आपका नाम ' एकलव्य ' भी --- बहुत शुभकामना

आदरणीय, आपके विचार हमारे लिए बहुमूल्य हैं। हृदय से आभार। "एकलव्य"

अच्छी रचना

हृदय से आभार। "एकलव्य"

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