मेरी माँ

13 मई 2017   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (220 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरी माँ  - शब्द (shabd.in)

वो चेहरा जो

शक्ति था मेरी ,

वो आवाज़ जो

थी भरती ऊर्जा मुझमें ,

वो ऊँगली जो

बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो

साथ रहते थे हरदम,

वो आँखें जो

दिखाती रोशनी मुझको ,

वो चेहरा ख़ुशी में

मेरी हँसता था ,

वो चेहरा दुखों में

मेरे रोता था ,

वो आवाज़

सही बातें ही बतलाती ,

वो आवाज़

गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली

बढाती कर्तव्य-पथ पर ,

वो ऊँगली

भटकने से थी बचाती ,

वो कदम

निष्कंटक राह बनाते ,

वो कदम

साथ मेरे बढ़ते जाते ,

वो आँखें

सदा थी नेह बरसाती ,

वो आँखें

सदा हित ही मेरा चाहती ,

मेरे जीवन

के हर पहलू संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,

चुनौती झेलने का गुर

सिखाया उससे खुद लड़कर ,

संभलना जीवन में हरदम

उन्होंने मुझको सिखलाया ,

सभी के काम तुम आना

मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे

सभी से नाता गया है छूट ,

वो मेरी बगिया की माली

जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,

गुणों की खान माँ को मैं

भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,

ह्रदय की वेदना में बंध

कलम आगे न अब चली

शालिनी कौशिक [कौशल ]

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ममतामयी स्नेह मूर्ति माँ

रेणु
13 मई 2017

बहुत बढ़िया शालिनी जी माँ ऐसी ही होती है -- बहुत हृदयस्पर्शी है आपकी रचना

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