माँ

14 मई 2017   |  नवीन कुमार जैन   (70 बार पढ़ा जा चुका है)



माँ का हृदय नदी सा, जिसमें बहती ममता की धारा ।

माँ का वात्सल्य अंबर सा,जिसमें समाहित जग सारा ।।

माँ दुख न बाँटती अपना, खुशियाँ सब संग मनाती है ।

माँ बच्चों को बहुत प्यारी, पिता की डाँट से बचाती है ।।


माँ बच्चों को, बड़ों का, सम्मान करना भी सिखाती है ।

माँ ही बाजार से,बच्चों को,नये-नये कपड़े

दिलाती है ।।

माँ बच्चों को खुश रखने, अपनी खुशियाँ भुलाती है ।

माँ खुद भूखी रहती पर,बच्चों को, हाथों से खिलाती है ।।


माँ के हाथों की रोटी , बच्चों को बहुत ही सुहाती है ।

माँ खुद चल जाए कांटों पर, बच्चों को गोद उठाती है ।।

माँ रात में नींद से उठकर, बच्चे को दवा पिलाती है ।

माँ एक कौर और, कह - कहकर पूरी रोटी खिलाती है ।।


माँ-माँ कह, जब बोले बच्चा, माँ फूली नहीं समाती है ।

माँ बच्चे की प्रथम गुरू है, बच्चे को निपुण बनाती है ।।

माँ राम और महावीर की गाथा, बच्चों को सुनाती है ।

माँ बच्चों को, संस्कारवान और बुद्धिमान बनाती है ।।


माँ लाड़-दुलार करती है, बच्चों का जीवन बनाती है ।

माँ; बच्चों के दुःख में, दुःखी हो अश्रु धार बहाती है ।।

माँ इस अनंत, अपार संसार रूपी दीपक में ; बाती है ।

माँ पतंग तो बच्चे धागा, बच्चों पर माँ जान लुटाती है ।।


© नवीन कुमार जैन (बड़ामलहरा)


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