काश, मेरी भी माँ होती!

14 मई 2017   |  एस. कमलवंशी   (937 बार पढ़ा जा चुका है)

काश, मेरी भी माँ होती!

काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।

प्रेम जताता, प्यार लुटाता,

चरण दबाता, हृदय लगाता,

जब कहती मुझे बेटा अपना, जीवन शायद सफल हो जाता,

काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।


मैं अनाथ बिन माँ के भटका, किसको अपनी मात् बताता,

जब डर लगता इस दुनियाँ का, किसका दामन मुझे छुपाता।

नींद कभी जो मुझे न आती, लोरी फिर मुझे कौन सुनाता,

मैं भी समझूँ माँ की ममता, गर कोई आँचल मुझे सुलाता।।


पीड़ा या जर ज्वर जब जकड़े, किसको समीप मैं अपने पाता,

बरबस फेरे, माथे मेरे, अब वह हाथ मैं कहाँ से लाता।

माँ के जैसी वह कोमलता, मरहम ज़ख्मों की अग्नि पर,

गर स्पर्श जो माँ का मिलता, दुःख-दरिद्र सबहिं मिट जाता।।


रिश्तों के सब रंग भी देखे, कोई रंग न मुझे है भाता,

तू है भ्रात, तू ही भगिनी माते, तू ही तात, तू भाग्य-विधाता।।

चरण-धूलि जो तेरी पाता, तो मंदिर मैं कभी न जाता,

छू लेता जो पैर तेरे मैं, सकल देवता तुझमें पाता।।


हे ईश्वर! क्या पाप किए थे? जो न मुझे मिली मेरी माता,

मेरी भी गर दुनियाँ होती, तो रब तेरा क्या था जाता,

हूँ देखता जब दुनियाँ में, कितनी ही मैया दिखती हैं,

सब हैं बेबस, सब हैं चाकर, कितनी ही पीड़ा सहती हैं।

दुनियाँ में जितनी जननी हैं, उनको तू ख़ुशहाल बना दे,

पर माँगता तुझसे आखिर, अगले जन्म मुझे माँ से मिला दे।


मिलती जो मुझे माँ एक पल, गीत मेरा अमर हो जाता,

काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।

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काश मेरी भी माँ होती तो आज आपकी इस रचना पर दिन भर मैं रोया न होता। माफ कीजिए मैं अपने आप को कुछ कहने से रोक न पाया।
धन्य हैं आप। धन्य है आपकी लेखनी।

मुझे आपके लिए खेद है मेरे मित्र। भगवान आपको खुशहाल रखे।

बहुत ही उम्दा लेखन ! सुन्दर ,आभार

धन्यवाद ध्रुव जी।

बहुत सुंदर भावयुक्त कविता. बधाई आदरणीय कमलवंशी जी

धन्यवाद प्रकाश जी। आपकी टिप्पणी के लिए ह्रदय से आभार।

रेणु
15 मई 2017

० प्रिय कमल वंशी आपको इस अद्भुत भावों और मातृहीनता की टीस को शब्द देती रचना के लिए बहुत बधाई -- आपकी लेखनी का परवाह अमर हो -- वैरी गुड -- और फिर से सस्नेह शाबाश ! ! !

रेणु जी... आपकी शुभकामनाओं एवं अपार स्नेह के लिए एक बार फिर से धन्यवाद।

रचनाकार को नमन। बहुत सुंदर प्रस्तुती

धन्यवाद शर्मा जी।

आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि मैं अपने विचार व्यक्त करने से खुद को रोक ही नही पाता हूँ।
आपकी रचना की पहली पंक्ति ही
"काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।"
नायक के दिल का हाल उजागर कर रही है।
यह पंक्ति देखने में साधारण किंतु सैकड़ों वेदनाओं को समेटे हुए है। आज मुझे सच में शब्दनगरी का आभार व्यक्त करते हुए हर्ष हो रहा है कि इस मंच पर आप जैसे संवेदनशील रचनाकार मौजूद हैं। आपका यह गीत अमर रहे। धन्यवाद।

मौर्य जी रचना पर अपनी विचारशीलता व्यक्त करने के लिए धन्यवाद। मुझे खुशी है कि आपको यह रचना पसंद आई।

कितने ही लोगों की माँ नहीं होती। उन सभी का हाल बयां करती है यह कविता भावुक है। भगवान से प्रार्थना करती हूं कि सभी को अपनी मां का प्यार मिले।

इस प्रार्थना के लिए धन्यवाद सपना जी।

हृदय पीड़ा को वर्णित करती अद्भुत रचना।
कमल जी आपका यह गीत अमर रहेगा। आदर सहित ऋषभ।

खंडेलवाल जी आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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