लोककथा——सियार का बदला (भाग-२)

15 मई 2017   |  ओमप्रकाश क्षत्रिय '' प्रकाश -   (438 बार पढ़ा जा चुका है)

( उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल की हो जनजाति की कथा पर आधारित. इस जनजाति की बोली कोलारियन भाषा समूह के अंतर्गत आती है.)हो लोककथा——सियार का बदला (भाग-२)



ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”   

एक बार की बात है. एक जंगल में एक चतुर सियार रहता था. एक दिन वह गुफा से बाहर निकल रहा था. तब उस की दरवाजे के पास निगाहें गई. वहा पर उसे एक मकड़ी का जाला नजर आया. उस में एक मधुमक्खी फंसी हुई थी.   

मधुमक्खी को जालें में फंसा देख कर सियार को दया आ गई. उस ने मधुमक्खी को मकड़ी के जाले से मुक्त कर दिया.   

आजाद हो कर मधुमक्खी बहुत खुश हुई. उस ने सियार को ढेर सारा शहद इनाम में दे दिया, '' यह मेरे छत्ते का सब से बढ़िया शहद है.''   

'' शुक्रिया !'' सियार ने शहद लिया और चल दिया.   

'' यह मेरे किस काम का ? मैं शहद तो खाता नहीं हूं,'' यह सोच कर वह अपनी गुफा की ओर जा रहा था. रास्ते में उसे एक चरवाहा मिला. वह भेड़ चरा रहा था. उस ने वह शहद चरवाहे को दे दिया.   

शहद बहुत बढ़िया था. चरवाहा प्रसन्न हो गया.   

'' इस शहद के बदले क्या चाहिए ? बोलो ?'' उस ने सियार से पूछा.   

सियार ने उस से एक भेड़ मांग ली.   

चरवाहें ने उसे खुशीखुशी एक भेड़ दे दी. वह उसे ले कर गुफा की ओर चल दिया. उस वक्त उस का पेट भरा हुआ था. उस ने भेड़ को गुफा में एक खूटे से बांध दिया .   

उसी गुफा के पास दो लोमड़िया रहती थी. वे बहुत चालाक थी. उन्हों ने सियार को भेड़ लाते ओर बांधते हुए देख लिया था.   

पहली चालाक लोमड़ी बोली, '' चलो ! आज हम भेड़ की दावत उड़ाते हैं.''   

तब दूसरी लोमड़ी ने कहा, '' यदि सियार को पता चल गया तो क्या होगा ?''   

पहली लोमड़ी बोली, '' उसे पता नहीं चलेगा. मेरे पास एक तरकीब है,'' कहते हुए दोनों लोमड़ी सियार की गुफा में चुपचाप घुस गई. फिर भेड़ को मार कर खा गई. इस के बाद उन लोमड़ियों ने भेड़ की खाल में भूसा भर दिया. फिर भेड़ को वैसे ही खड़ा कर दिया जैसे वह पहले खड़ी थी.

शाम को सियार वापस आया. उस ने भेड़ का देखा. मगर, यह क्या ? वहां भूसा भरी हुई भेड़ खड़ी थी. जमीन पर लोमड़ियों के पैर के निशान बने हुए थे.   

इन्हें देख कर सियार समझ गया कि उस की पड़ोस की लोमड़ियों ने उस के साथ चालाकी की है. इसलिए सियार ने चालाक लोमड़ी को सबक सिखाने की सोचा.   

तब सियार ने भेड़ की खाल उतारी. उस से एक ढोलक बना लीं. फिर उसे बजाने लगा. लोमड़ियों को नाचने का शौक था. ढोलक की थाप सुन कर वे नाचने लगी.

जब ढोलक बजना बंद हो गई तब पहली वाली चालाक लोमड़ी ने सियार से पूछा,'' यह ढोलक तुम्हें कहां से मिली ?''   

इस पर सियार ने जवाब दिया, '' यही पास में एक कुआं है. उस में बहुत सारी ढोलक पड़ी हुई है. तुम चाहो तो वहां से ढोलक ला सकती हो. ''  '' अच्छा !'' दूसरी चालाक लोमड़ी ने कहा, '' हमें वह कुआं बता सकते हो ?''   

सियार यही चाहता था. उस ने कहा, ''हांहां. क्यों नहीं. अभी चलो !'' कहते हुए सियार उन्हें कुंए के पास ले गया.   

सब से पहले सियार ढोलक सहित कुंए की मुंडैर पर चढ़ गया. फिर लोमड़ियो को ऊपर बुला कर बोला, '' वह देखो. वहां ढोलक नजर आ रही है. तुम जितनी चाहे उतनी ढोलक ले सकती हो .''   

लोमड़ी ढोलक पाना चाहती थी. वे तुरंत कुएं में कूद गई.   

कुंए में पानी भरा था. उस में सियार के गले में लटकी ढोलक की परछाई दिख रही थी. उसे असली ढोलक समझ कर लोमड़ी पानी में कूद गई थी. उन्हें तैरना नहीं आता था, इसलिए वे पानी में डूब कर मर गई.   

इस तरह चतुर सियार ने चालाक लोमड़ी से अपना बदला ले लिया.



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लोकण्कथायें चाहे भारत के किसी राज्य की हों या अंतरराष्ट्रीयए मुझे बचपन से ही आकृष्ट कर मेरा मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्धन करतीं रहीं हैं। लोकण्कथा पर आधारित इस बेहतरीन बालण्कथा को पढ़कर मुझे वे सभी बालण्पत्रिकायें याद आ गईंए जिनमें मैं आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश जी की रचनाएं भी चाव से पढ़ता था। उस समय आपसे अन्य कोई परिचय नहीं था। सोशल मीडिया पर आपकी अन्य विधाओं हाइकूध्लघुकथा आदि की बेहतरीन रचनाएं पढ़ते हुए आप का पूरा परिचय हासिल हुआ। इस पृष्ठ पर संयोग से पहुंच कर इस विधा की यह बेहतरीन रचना पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। श्होण्लोकण्कथाश् पर आधारित यह रचना न सिर्फ बच्चों बल्कि बड़ों को भी दुनिया में सतर्क व चतुर बनने की प्रेरणा देती है। छोटेण्छोटे वाक्यों में सरल बालण्सुलभ भाषा में चतुर लोमड़ियों को शिक़स्त देता चतुर सियार हमें चीज़ों के आदानण्प्रदान व देखण्रेख के संदर्भ में बहुत चतुराई से काम लेने की प्रेरणा व शिक्षा देती है। बेहतरीन शीर्षक के साथ चिरण्परिचित अंदाज में बढ़िया शैली की इस रचना के लिए लेखक महोदय आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय श्प्रकाशश् जी को तहे दिल से बहुतण्बहुत बधाई और शुभकामनाएं। ण् शेख़ शहज़ाद उस्मानी शिवपुरी यमध्यप्रदेशद्ध ख्18ण्5ण्2017ए,

आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी आप की विस्तृत समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ कर मन गदगद हो गया. शुक्रिया आप का .

आदरणीय बालकहानी पढ़िए ही नहीं , उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिए. ये प्रतिक्रिया मुझे ओर बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करेगी. सादर.

बहुत सुन्दर बाल कथा आदरणीय ओम प्रकाश जी

शुक्रिया आदरणीय तेज वीर सिंह जी

बहुत खूब

आभार आदरणीय नृपेंद्र कुमार शर्मा जी

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