तुम क्या हो

15 मई 2017   |  ravi bhujang   (98 बार पढ़ा जा चुका है)


कभी बनारस की सुबह बन जाती हो।
तो भोपाल की शाम हो जाती हो।
तुम रास्तें के दृश्य हो या,
दोनों पर एक आसमां।
तुम चेतन की किताब का किरदार
तो नहीं हो, तुम जो हो
हमेशा हो। चार कोनो में नहीं
होती तुम, तुमने ही तुम्हें रचा हैं।
अब प्रेम का क्या वर्णन करूँ,
मेरा प्रेम तो तुम्हारा हँसना हैं।
और तुम्हारी भीगी कोर
मेरा मर जाना हैं।
शुरू हुआ प्रेम और अमरता का
प्रेम, दोनों के बीच का
तुम प्रश्न हो। उत्तर भी तुम।

अगला लेख: नेह भरी पाती



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें

शब्दनगरी से जुड़िये आज ही

सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x