"चरखा" 'कविता'

15 मई 2017   |  ध्रुव सिंह -एकलव्य-   (522 बार पढ़ा जा चुका है)

"चरखा"  'कविता'

हे ! वरदानी

तुम आन

बसो !

मेरे अंदर

वो प्राण

भरो !

कायर होता,मैं

मन ही मन

वीर सा तुम

उत्कर्ष भरो !

हे ! मानव रक्षक

अभिमानी

विश्वास भरो !

आभास भरो !

चित्त को पावन

अब कर दो ! तुम

अमृत वाणी ! कुछ

कहके तुम

जीवन का मार्ग

प्रशस्त्र करो !

हे ! वरदानी

तुम आन

बसो !

मेरे अंदर

वो प्राण

भरो !

हे ! काल के

अन्तर्यामी तुम

बनकर एक कीर्तिमान

रचो !

तुम सोये क्यूँ ?

रसातल जाकर

जग जाओ !

कुछ तो

कर्म करो !

ये धर्म बनाया

तूने क्यूँ ?

क्यूँ ? कर्म बनाया

इसको तूं !

मैं धर्म ढो रहा !

तेरे लिए

कुछ कर्म

कर रहा !

अपने लिए

बस पाने को !

छाया तेरी

बस गाने को !

माया तेरी

वे बना रहें

उल्लू ! मेरा

कुछ नचा रहें

चरखा ! तेरा

तूँ आँखें मूंदे !

बैठा है

तूं गूँगा बनकर

ऐंठा ! है

वे गला रहें हैं !

दाल अपनी

कुछ उड़ा रहें

लज्जा ! मेरी

वे कोंच रहें

सुईयां ! हरपल

वे नोंच रहें

इच्छाओं को

मैं खोज रहा !

आशा ओं को

मैं भंवर में

डूबता हूँ !

हरपल

एक जलन में

जीता हूँ !

पल -पल

हे ! वरदानी

तुम आन

बसो !

मेरे अंदर

वो प्राण

भरो !



"एकलव्य"




अगला लेख: वेबपेज



आपके बहुमूल्य विचारों का स्वागत है आभार

रेणु
17 मई 2017

बहुत ही सुन्दर -- जीवन के उत्कर्ष के आह्वान से भरी अनुपम रचना -- बहुत बढ़िया और सार्थक -- ध्रुव जी - आपको हार्दिक शुभकामना

बहुत बढ़िया रचना

धन्यवाद, आदरणीय ,आपके विचार हमारे लिए बहुमूल्य हैं ,आभार

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x