कब समझोगी तुम

17 मई 2017   |  Karan Singh Sagar ( डा. करन सिंह सागर)   (103 बार पढ़ा जा चुका है)

दिल की आवाज़

निगाहों के इशारों

मन की बात

कब समझोगी तुम

इन जज़्बातों को

इस बेक़रारी को

इन उमंगो को

कब समझोगी तुम

इस रिश्ते को

इन उम्मीदों को

इस प्यार को

कब समझोगी तुम


१३ मई २०१७

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रेणु
18 मई 2017

आपकी एक और हृदयस्पर्शी रचना पढ़कर अच्छा लग रहा है करण जी --

अच्छा है।

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18 मई 2017
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18 मई 2017
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