मित्र का चित्र

20 मई 2017   |  एस. कमलवंशी   (440 बार पढ़ा जा चुका है)

मित्र का चित्र

सुरमई आँखों को सजाएँ, काज़ल की दो लकीरें,

मैंने इनमें बनती देखी कितनी ही तसवीरें,

तसवीरों के रंग अनेकों, भांति-भांति मुस्काएं,

कुछ सजने लगी दीवारों पर, कुछ बनने लगी तक़दीरें।


कुछ में फैला रंग केसरिया, कुछ में उढ़ती चटक चुनरिया,

कुछ के रंग सफ़ेद सुहाने, कुछ में नागिन लचक कमरिया,

कुछ में गोरी चहल मचाती, कुछ में गोरी गाना गाती,

कुछ में गोरी हवा की पहरी, कुछ में ठहरी अटक बदरिया।

कुछ में पंख सहारे उढ़ती, कुछ में अलक बहारें जुड़ती,

कुछ में कस्तूरी मृग नयनी, कुछ में पलक झुकाए मुढ़ती,

कुछ में चलती लटक मटक के, कुछ में चलती चाल नवाबी,

कुछ में ढलती साँझ लबों पर, कुछ में मादक नैन शराबी।।


एक रंग अफताब समाया, दूजा रंग सुनहरी काया,

तीजा रंग मधुशाला-मदीरा, चौथा रंग महर की माया,

कितने रंग की ये तस्वीरें, कौन सा अपना कौन पराया,

कैसे पूंछु उस कर्ता से, चित्रकार चितचोर समाया।


एक चित्र ऐसा भी देखा, चित्र में मित्र विचित्र अनोखा,

चितवन चोर चुराए चेतन, चितवन चैन असीम अलोका,

चन्द्र-चमक चमके चहुओरी, चापर चपल चिरागी चोगा,

चित्र चाल, चन्न यार चमाचम, चित्र-मित्र मायावी धोखा।


धोखा, माया, खेल रचाया, शातिर उलझा, पार न पाया,

छोड़ तेरा दर भोर सबेरे, साँझ ढले तेरे पास मैं आया।

पलकें गिरें, फिर पलकें उठें, न जाने इनमें कौन समाया,

ले कागज फरियाद का मैं, तेरी पलकों का चित्र बनाया।


कभी रात जगी इन पलकों पर, कभी सुबह खिली भीनी भीनी,

कभी ओस मिली सिरहाने से, कभी बरस पड़ीं झीमी झीमी,

कभी बाँध लिया इन आँखों ने, कभी बन बैठीं ये आईना,

कभी आया इनमें नूर नज़र, कभी बहने लगीं धीमी धीमी।

कभी पार किया इन्हें तैराकर, कभी डूब गए इस दरिया में,

फिर सोचा न कभी मंज़िल का, जब आया मज़ा इस जरिया में।।


बरसों बरबस फिर चित्र बने, कितने सुलगे कितने ही जरे,

कौन सा रंग कहा पर फेरूँ, समझ समझ कर समझ मरे,

इतने मंज़र इक चित्र तले, कैसे कोई इनको कैद करे,

कोई कैद करे, कर कैद डरे, जब हो कैदी हर कैद परे।

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काबिल-ए-तारीफ।
एक प्रश्न है... इस कविता में चित्रकार कौन है?

धन्यवाद ऋषभ जी। इस कविता में दर्शक जो तसवीरें देख रहा है वे सभी उसी के द्वारा बनाई हुई हैं। अतः स्वयं दर्शक ही चित्रकार है।

वाह वाह बहुत सुंदर रचना ।

धन्यवाद शर्मा जी।

विभिन्न भावों से भरी रचनात्मकता है आपकी कमलजी। मध्य कविता में आपने अनुप्रास अलंकार की जो सुंदर छटा बिखेरी है वह अतुल्य है। साहित्य आज भी ज़िंदा है यह जानकर दिल गदगद हो गया।

धन्यवाद प्रवेश जी।

रेणु
21 मई 2017

कमालवंशी आपकी लेखनी से एक और अद्भुत भावों से भारी सुंदर रचना निकली है -- जिसकी मैं जिनती तारीफ करूँ कम है -- लिखते रहिये -- रुकिए नहीं -- वैरी गुड -- सस्नेह

आपका बहुत बहुत धन्यवाद रेणु जी।

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