जूते की आत्मकथा

20 मई 2017   |  विजय कुमार शर्मा   (2524 बार पढ़ा जा चुका है)

एक आम कहावत है कि उसने उसको जूते-चप्पलों से पीटा। मगर एक समय ऐसा भी था जब आठवीं कक्षा के मेरे अध्यापक ने चाय पीते-पीते ही पूरी कक्षा को जूते की आत्मकथा लिखनी सिखाई। अध्यापक महोदय ने आरंभ करते हुए कक्षा को बताया कि जूते की आत्म लिखना बहुत आसान है। लिखो गाँव में राम लाल की भैंस मर गई। उस मरी हुई भैंस को चमड़ा उतारने वाले उठा ले गए। उन्होंने चमड़ा उतारकर चमड़ा व्यापार िओं को बेच दिया। वहां से चमड़ा गया जूता कारखाना। जूते के रुप में तैयार होकर मैं जूतों की दुकान पर पहुंच गया। सेठ करोड़ीमल मुझे खरीद लाए और समारोहों व खास अवसरों पर ही मुझे पहनते। ज्यों-ज्यों मैं पुराना होता गया मेरा उपयोग बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि सेठ जी बाथरुम जाते समय ही मेरा उपयोग करने लगे व एक दिन पुराना हुआ मानकर सेठजी ने मेरा उपयोग बंद कर दिया । मगर सेठ करोड़ीमल के नौकर की नजर हमेशा मुझे घूरती रहती थी। फिर क्या था सेठ जी ने खुश होकर मुझे नौकर बबलू के हवाले कर दिया। फिर क्या था एक बार फिर से मेरा उपयोग बढ़ गया। धीरे-धीरे फिर से वही किस्सा दोहराया गया मेरे साथ। थक हारकर मैंने दम तोड़ दिया।

किसी की भी आत्मकथा की तैयारी में अनुभवों की अहम भूमिका होती है। मगर पूरे के पूरे शैक्षणिक काल में किसी भी परीक्षा में मुझे इस तरह आत्मकथा लिखने को नहीं मिली और मेरे अध्यापक से मिला ज्ञान आजतक मेरी यादों का ही एक हिस्सा बना हुआ है। अगर इस तरह की आत्मकथा लिखने को मिलती तो मैं पांचवी कक्षा का अनुभव भी जोड़ देता जिस समय मेरी क्लास टीचर को चमड़े की बदबू आ रही थी। पता चलता है कि मेरा एक सहपाठी उसदिन नया जूता पहनकर आया था। इसलिए अध्यापक महोदया को जूते के नए चमड़े से बदबू आ रही थी। एक बार एक व्यक्ति अपने परिवार को साईकल पर बैठाकर पूरी स्पीड से एक पुल से नीचे उतर रहा था और परिवार सहित पूरा का पूरा साईकल पैदल जा रहे तीन युवाओं से भिड़ गया। तीनो युवा उस व्यक्ति पर टूट पड़े। उस व्यक्ति की पत्नी ने आव देखा न ताव अपना जूता उतारा और तीनो युवाओं की धुनाई आरंभ करदी। वे तीनो युवा राहगीरों से पिटने के डर से मैदान छोड़कर भाग निकले। बाद में इतिहास के पन्ने पलटने से ज्ञात हुआ कि महात्मा गाँधी जी ने भी अपने हाथ से बनी हुई एक जूतों की जोड़ी साऊथ अफरीका के तानाशाह जनरल स्मटस को भेंट स्वरुप दी थी। मगर आजकल हद तो तब है जब जूता सफेदपोशों के विरोध का हथियार बन गया है और वे रातों रात स्टार बनने लगे हैं। सबसे पहले जूता उछला अमेरीका के राष्ट्रपति की ओर। भारत में यह शुरुआत की आज के आम आदमी पार्टी के एक प्रमुख नेता जरनैल सिंह ने उस समय के यूपीए सरकार में कदावार नेता व मंत्री पी. चिदंबरम की ओर जूता उछालकर। उसकी इसी योग्यता ने उसे दिल्ली में आम आदमा पार्टी की टिकट पर एमएलए जितवा दिया। रही सही कसर निकाल दी है शिवसेना के एक एमपी ने। जिसने एयर इंडिया के एक बड़े अधिकारी को 25 बार जूतों से पीट दिया। इन सबके अतिरिक्त उस आत्मकथा में यह भी जोड़ना पड़ता कि मरी हुई भैंस को ले जाने वालों को पशुभक्तों ने रास्ते में रोककर पूछताछ की कि कहीं उन्होंने ही भैंस का कत्ल तो नहीं किया ? जरा सोचिए एक अर्से से जूते की आत्मकथा से संबंधित दिमाग में बंद ज्ञान किस रुप में पाठकों तक पहुंच रहा है।

अगला लेख: भारतीय प्रजातांत्रिक केंद्रवाद बनाम राष्ट्रपति पद्धति सरकार



सुंदर प्रस्तुति

बहुत खूब

विजय जी , आपने तो मास्टर जी के सिंपल से लेख में चार चाँद लगा दिए. पढ़ कर बढ़िया लगा ,जैसे जैसे हम बड़े होते है ऐसे ही हर याद में कुछ न कुछ जुड़ता रहता है . आत्मकथा मज़ेदार लिखी

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x