प्रेरणा

20 मई 2017   |  ज़िआउल हुसैन   (68 बार पढ़ा जा चुका है)

मन मीत मेरे संगीत मेरे ..

ये जनम जनम का नाता है ..

सदियों से चली ये रीत है ..

प्रेम की न कोई परिभासा है ..


जो आता है वो जाता है ..

यही जग से सबका नाता है ..


कोई रोता है कोई मुस्काता है ..

सबका एक ही जनम दाता है ..


कोई रुखा खाये कोई सूखा सोये ..

सब अपने भाग्य का खाता है ..


जो गीर के फिर उठ जाता है , वही प्रेरणा दे जाता है ..

वीरो के आगे दुनिया ही नहीं ख़ुदा भी सर झुकता है ..!!!

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रेणु
24 मई 2017

हुसैन जी बहुत भावपूर्ण लगी आपकी रचना

सबका एकहि जन्मदाता है। यही सच है।

सत्यम सीवम सुंदरम

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