नेह भरी पाती

21 मई 2017   |  डॉ हरेश्वर   (123 बार पढ़ा जा चुका है)

नेह भरी पाती

  • नेह भरी

पाती

अब नहीं आती.


गुप्तवास में

माँ की लोरी

गूंगी बहरी

चैती होरी

सुखिया दादी

पराती

अब नहीं गाती


अंगनाई की

फट गई छाती

चूल्हे चौकों की

बँट गई माटी


पूर्वजों की

थाती

अब नहीं भाती.

-- डॉ. हरेश्वर राय

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रेणु
21 मई 2017

मन भिगोने वाली -- भावपूर्ण रचना -- हरेश्वर जी आपकी रचना बहुत अच्छी लगी --

चूल्हे चौकों की बंट गई माटी,,,बहुत ही संवेदनापूर्ण भाव।

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