भारतीय

24 मई 2017   |   कुँवर दीपक रावत   (93 बार पढ़ा जा चुका है)

मिट गयीं वो हस्तियाँ,

और उनकी बस्तिया

जो मिटाने के लिए, हमे आई हैं


थम गयीं वो आँधियाँ,

बुझ गयीं वो बातिया

जो जलाने के लिए, हमे आई हैं


कट गये वो कर,

झुक गये वो सर

जो झुकने के लिए, हमे आए हैं


– कुँवर दीपक रावत

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रेणु
24 मई 2017

बहुत सुंदर प्रेरक पंक्तियाँ

हृदय से आभार रेणु जी

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24 मई 2017
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