भारतीय

24 मई 2017   |   कुँवर दीपक रावत   (102 बार पढ़ा जा चुका है)

मिट गयीं वो हस्तियाँ,

और उनकी बस्तिया

जो मिटाने के लिए, हमे आई हैं


थम गयीं वो आँधियाँ,

बुझ गयीं वो बातिया

जो जलाने के लिए, हमे आई हैं


कट गये वो कर,

झुक गये वो सर

जो झुकने के लिए, हमे आए हैं


– कुँवर दीपक रावत

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रेणु
24 मई 2017

बहुत सुंदर प्रेरक पंक्तियाँ

हृदय से आभार रेणु जी

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24 मई 2017
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24 मई 2017
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जलते हुए शोलों से दोस्ती कर ली ! खुद खाक होने की, साज़िश कर ली !! इन सर्द बर्फ़ीली हवाओं में, वो बात कहाँ ! एक धूप की ख्वाहिश में, रोशनी कर ली !! तेरे दामन में, या मेरे आशियाने में ! एक बूँद की चाहत में, बारिश कर ली !! वो तो नहीं हुआ जो, दिल की आरज़ू थी ! हर शाम
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मूक क़लम को साधकरभावनाए बाँधकरहोठों पे गुनगुनाते हुयेआधे अधूरे से गीतों कोरात के अँधेरे मेंदीपक के प्रकाश सेवह लिख रहा होगावह लिख रहा होगा- कुँवर दीपक रावत
24 मई 2017
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