इबादत

24 मई 2017   |   कुँवर दीपक रावत   (111 बार पढ़ा जा चुका है)

जलते हुए शोलों से दोस्ती कर ली !

खुद खाक होने की, साज़िश कर ली !!


इन सर्द बर्फ़ीली हवाओं में, वो बात कहाँ !

एक धूप की ख्वाहिश में, रोशनी कर ली !!


तेरे दामन में, या मेरे आशियाने में !

एक बूँद की चाहत में, बारिश कर ली !!


वो तो नहीं हुआ जो, दिल की आरज़ू थी !

हर शाम तेरी आहट पे, तसल्ली कर ली !!


हर बात से नाराज़, और खफा हुए !

हर बार समझने की, कोशिश कर ली !!


ना समझ पाएँगे लोग, इस बात का मतलब !

यह सोच के हर बार, राहत कर ली !!


कुछ माँगने की आदत, कभी थी नहीं हमारी !

तेरी खुशी समझकर, इबादत कर ली !!


- कुँवर दीपक रावत

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धन्यवाद

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